18.09.2019 ►SS ►Sangh Samvad News

Posted: 18.09.2019
Updated on: 30.09.2019

Updated on 18.09.2019 20:51

👉 *कुम्बलगुडु, बैंगलोर से -*

💠 *अभातेमम का 44 वां राष्ट्रीय महिला अधिवेशन 2019*

🌼 *सान्निध्य - आचार्य श्री महाश्रमण*

🌼 *प्रेरणा पाथेय - साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा*

🔼 *उर्ध्वारोहण सत्र*

विषय: उन्नयन का आधार - आचार, विचार, व्यवहार, संस्कार

🔼 *पूज्यवर ने दिया मोहनीय कर्म खाली करने का प्रेरणदायी उद्बोधन*

🔼 *नव निर्वाचित अध्यक्ष श्रीमती पुष्पा बैद ने ली शपथ*

🔼 *निवर्तमान अध्यक्ष श्रीमती कुमुद कच्छारा ने नव निर्वाचित अध्यक्ष श्रीमती पुष्पा बैद को किया दायित्व हस्तांतरण*

🔼 *नवनिर्वाचित अध्यक्ष द्वारा 2019-2021 कार्यकाल के लिए संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत*

🔼 *श्रीमती प्यारीदेवी गादिया को श्राविका गौरव अलंकरण प्रदान*

🔼 *श्रीमती सोनिया जैन व सुश्री डॉ श्वेता भंसाली प्रतिभा पुरस्कार से सम्मानित*

🔼 सत्र के कुछ विशेष दृश्य

दिनांक 18-09-2019

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

👉 *कुम्बलगुडु, बैंगलोर से -*

💠 *अभातेमम का 44 वां राष्ट्रीय महिला अधिवेशन 2019*

🌼 *सान्निध्य - आचार्य श्री महाश्रमण*

🌼 *प्रेरणा पाथेय - साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा*

🔼 सत्र - उन्नयन की थामे डोर - बढ़े नव सृजन की ओर

🔼 *नव निर्वाचित अध्यक्ष श्रीमती पुष्पा बैद ने रखा अपना विजन*

🔼 महाप्रज्ञ प्रबोध प्रतियोगिता का आयोजन

दिनांक 17-09-2019

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

👉 *श्री चरणों* मे अणुव्रत कार्यक्रमो सम्बधी जानकारी निवेदित

👉 हैदराबाद - तेरापंथ युवक परिषद् द्वारा अभिनव अंताक्षरी प्रतियोगिता आयोजित

👉 हुबली ~ कन्यामण्डल के द्वारा "सोरी महकाएं जीवन की क्यारी" कार्यशाला आयोजित

👉 सिलीगुड़ी - अभिनन्दन समारोह

👉 रायपुर- अभातेयुप द्वारा संगठन यात्रा

👉 फरीदाबाद- मासखमण तप की अनुमोदना

प्रस्तुति: 🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

👉 *कुम्बलगुडु, बैंगलोर से -*

💠 *अभातेमम का 44 वां राष्ट्रीय महिला अधिवेशन 2019*

🌼 *सान्निध्य - आचार्य श्री महाश्रमण*

🌼 *प्रेरणा पाथेय - साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा*

🔼 द्वितीय दिवस सत्र -आरोहण

विषय - उन्नयन का आधार:श्रावक्त्व का विस्तार

🔼 *साध्वी प्रमुखा श्री जी द्वारा मार्मिक सम्बोधन*

🔼 *मुख्य नियोजिका विश्रुत विभा जी द्वारा प्रेरणदायी उद्बोधन*

🔼 *अभातेमम को मिला रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र*

दिनांक 17-09-2019

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

👉 *कुम्बलगुडु, बैंगलोर से -*

💠 *अभातेमम का 44 वां राष्ट्रीय महिला अधिवेशन 2019*

🌼 *सान्निध्य - आचार्य श्री महाश्रमण*

🌼 *प्रेरणा पाथेय - साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा*

🔼 *नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्रीमती पुष्पा बैद द्वारा वर्ष 2019-2021 के लिए घोषित पदाधिकारी टीम*

दिनांक 18-09-2019

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

👉 *कुम्बलगुडु, बैंगलोर से -*

💠 *अभातेमम का 44 वां राष्ट्रीय महिला अधिवेशन 2019*

🌼 *सान्निध्य - आचार्य श्री महाश्रमण*

🌼 *प्रेरणा पाथेय - साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा*

🔼 सत्र - उत्कर्ष

विषय - Roll & chalange of women in 2050

🔼 मोटिवेटर श्री बी सी भलावत द्वारा प्रशिक्षण

🔼 पुरस्कार वितरण

दिनांक 16-09-2019

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

👉 *कुम्बलगुडु, बैंगलोर से -*

💠 *अभातेमम का 44 वां राष्ट्रीय महिला अधिवेशन 2019*

🌼 *सान्निध्य - आचार्य श्री महाश्रमण*

🌼 *प्रेरणा पाथेय - साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा*

🔼 द्वितीय सत्र - अवलोकन सत्र

विषय: संस्था संचालन - समीक्षा एवं नीति निर्धारण

🔼 तृतीय सत्र - उमंग सत्र - पारितोषिक वितरण

दिनांक 16-09-2019

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

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'सम्बोधि' का संक्षेप रूप है— सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र। यही आत्मा है। जो आत्मा में अवस्थित है, वह इस त्रिवेणी में स्थित है और जो त्रिवेणी की साधना में संलग्न है, वह आत्मा में संलग्न है। हम भी सम्बोधि पाने का मार्ग प्रशस्त करें आचार्यश्री महाप्रज्ञ की आत्मा को अपने स्वरूप में अवस्थित कराने वाली कृति 'सम्बोधि' के माध्यम से...

🔰 *सम्बोधि* 🔰

📜 *श्रृंखला -- 41* 📜

*अध्याय~~3*

*॥आत्मकर्तृत्ववाद॥*

💠 *भगवान् प्राह*

*19. मिथ्यात्वं मोह एवास्ति, तेनात्मा विकृतो भवेत्।*

*सचिरं बद्ध्यते सैष, स्वल्पं चारित्रमोहतः।।*

मोह का एक ही प्रकार है मिथ्यात्व। उससे आत्मा विकृत होता है। मिथ्यात्व-मोह-दर्शनमोह से आत्मा दीर्घकाल तक बद्ध होता है और चारित्रमोह से मिथ्यात्व-मोह की अपेक्षा अल्पकाल तक बद्ध होता है।

*20. अज्ञानञ्चादर्शनञ्च, विकुर्वाते न वा जनम्।*

*विकाराणां च सर्वेषां, बीज मोहोस्ति केवलम्।।*

अज्ञान और अदर्शन— ज्ञानावरण और दर्शनावरण आत्मा को विकृत नहीं बनाते। जितने विकार हैं, उन सबका बीज केवल मोह है।

*21. ते च तस्योत्तेजनाय, हेतुभूते पराण्यपि।*

*परिकरत्वं मोहस्य, कर्माणि दधते ततः।।*

ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म तथा शेष सभी कर्म मोहकर्म को उत्तेजित करने में निमित्त बनते हैं। इसलिए मोहकर्म सबमें प्रधान है और शेष सब कर्म उसी के परिवार हैं।

*22. मस्तकेषु यथा सूच्यां, हतायां हन्यते तलः।*

*एवं कर्माणि हन्यन्ते, मोहनिये क्षयं गते।।*

जिस प्रकार ताड़ की सूची— अग्रभाग नष्ट होने पर ताड़ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मोहकर्म के क्षीण होने पर दूसरे कर्म क्षीण हो जाते हैं।

*23. सेनापतौ विनिहते, यथा सेना विनश्यति।*

*एवं कर्माणि नश्यन्ति, मोहनीये क्षयं गते।।*

जिस प्रकार सेनापति के मारे जाने पर सेना पलायन कर जाती है, उसी प्रकार मोहकर्म के क्षीण होने पर दूसरे कर्म क्षीण हो जाते हैं।

*24. धूमहीनो यथा वह्निः, क्षीयतेऽसौ निरिन्धनः।*

*एवं कर्माणि क्षीयन्ते, मोहिनीये क्षयं गते।।*

जिस प्रकार धूम-हीन और इंधन-हीन अग्नि बुझ जाती है, उसी प्रकार मोहकर्म के क्षीण होने पर दूसरे कर्म क्षीण हो जाते हैं।

*25. शुष्कमूलो यथा वृक्षः, सिच्यमानो न रोहति।*

*नैवं कर्माणि रोहन्ति, मोहनीये क्षयं गते।।*

जिसकी जड़ सूख गई हो, वह वृक्ष सींचने पर भी अंकुरित नहीं होता, उसी प्रकार मोहकर्म के क्षीण होने पर कर्म अंकुरित नहीं होते।

*26. न यथा दग्धबीजानां, जायन्ते पुनरंकुराः।*

*कर्मबीजेषु दग्धेषु, न जायन्ते भवांकुराः।।*

जिस प्रकार जले हुए बीजों से अंकुर उत्पन्न नहीं होते, उसी प्रकार कर्म-बीजों के जल जाने पर जन्म-मरण रूप अंकुर उत्पन्न नहीं होते।

*मोह-क्षय का फल... विशुद्ध दर्शन का हेतु और परिणाम... स्थिरता से निर्वाण... निर्मल चित्तवाले को आत्मदर्शन...* समझेंगे और प्रेरणा पाएंगे... आगे के श्लोकों में... हमारी अगली श्रृंखला में... क्रमशः...

प्रस्तुति- 🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

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जैन धर्म के आदि तीर्थंकर *भगवान् ऋषभ की स्तुति* के रूप में श्वेतांबर और दिगंबर दोनों परंपराओं में समान रूप से मान्य *भक्तामर स्तोत्र,* जिसका सैकड़ों-हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन श्रद्धा के साथ पाठ करते हैं और विघ्न बाधाओं का निवारण करते हैं। इस महनीय विषय पर परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की जैन जगत में सर्वमान्य विशिष्ट कृति

🙏 *भक्तामर ~ अंतस्तल का स्पर्श* 🙏

📖 *श्रृंखला -- 129* 📖

*गुणों की माला पहनें*

गतांक से आगे...

बहुत लोग आते हैं, कहते हैं— डर बहुत लगता है। दिन में भी लगता है, रात को भी लगता है। अंधेरे में ही नहीं, धोली दुपहरी में भी लगता है। आकाश में सूरज तप रहा है, उजला-उजला प्रकाश है, उस समय में भी डर लगता है। अकेले में ही नहीं, अनेक लोगों के बीच में भी डर लगता है। भय एक ऐसी स्थिति है, जिसके बारे में समझना भी बड़ा कठिन होता है। कोई मानसिक तंत्र विकृत हो जाता है तो बार-बार भय की कल्पना आती है। इस स्थिति में मानतुंग सूरि ने भगवान् ऋषभ की स्तुति के माध्यम से जो अभय का पाठ दिया है, उससे अभय बना जा सकता है, भय को दूर किया जा सकता है। सबसे बड़ा भय है— प्रमाद। सबसे बड़ा अभय है— अप्रमाद, जागरूकता। भगवान् महावीर ने साधना का सबसे बड़ा सूत्र दिया— अप्रमाद। अप्रमत्त के लिए कोई भय नहीं है। जहां भी प्रमाद आया, भय पैदा हो गया। अप्रमाद सबसे बड़ी साधना है अभय की। अप्रमाद का अर्थ है— अभय और प्रमाद का अर्थ है— भय। भय प्रमाद से पैदा होता है और अभय अप्रमाद से पैदा होता है। आचार्य मानतुंग ने अप्रमत्तता की साधना के लिए संकेत किया है और वह संकेत बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इन बीज मंत्रों का, इन श्लोकों का बड़ा महत्त्व है। अगर इनकी ठीक साधना चले, आराधना चले तो इन आठ भयों के सहारे अन्य भयों से भी आदमी मुक्ति पा सकता है।

स्तोत्र की संपन्नता आचार्य मानतुंग इस काव्य के द्वारा कर रहे हैं—

*स्तोत्रस्रजं तव जिनेन्द्र! गुणैर्निबद्धां,*

*भक्त्या मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पाम्।*

*धत्ते जनो य इह कंठगतामजस्रं,*

*तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः।।*

मानतुंग ने कहा— मानतुंग का लक्ष्मी वरण करती है। जो मानतुंग होता है, लक्ष्मी उसका वरण करती है। मानतुंग स्तुतिकार का नाम भी है। मानतुंग का एक अर्थ है— जिसको बहुत सम्मान मिलता है, उसका नाम है मानतुंग। सम्मान से, पूजा से जो ऊंचा बन गया है, वह मानतुंग। तुंग का अर्थ है शिखर। इतना सम्मान मिला कि व्यक्ति शिखर पर चला गया। एवरेस्ट की चोटी पर चला गया। लक्ष्मी उसके पास आती है, पर निमंत्रण के द्वारा नहीं, अपनी स्वतंत्र इच्छा से आती है। वह यह सोचती है— मैं उस व्यक्ति के पास जाऊं, उसका वरण करूं। उस व्यक्ति के पास रहूं, जो मानतुंग है। जो गले में हार पहनता है, माला पहनता है, फूलों और धागे की माला नहीं किंतु गुणों की माला पहनता है, उस व्यक्ति के पास वह लक्ष्मी आती है।

*गुणों की माला कैसे बनाई गई...?* जानेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...

प्रस्तुति -- 🌻 संघ संवाद 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

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शासन गौरव मुनिश्री बुद्धमल्लजी की कृति वैचारिक उदारता, समन्वयशीलता, आचार-निष्ठा और अनुशासन की साकार प्रतिमा "तेरापंथ का इतिहास" जिसमें सेवा, समर्पण और संगठन की जीवन-गाथा है। श्रद्धा, विनय तथा वात्सल्य की प्रवाहमान त्रिवेणी है।

🌞 *तेरापंथ का इतिहास* 🌞

📜 *श्रृंखला -- 141* 📜

*आचार्यश्री भीखणजी*

*जीवन के विविध पहलू*

*13. तीखे आलोचक*

*मिठाई कड़वी है*

किसी व्यक्ति ने स्वामीजी से कहा— 'कुछ व्यक्तियों को तो आप बहुत अच्छे लगते हैं, परंतु कुछ व्यक्ति आपको बिल्कुल पसंद नहीं करते, इसका क्या कारण है?'

स्वामीजी ने कहा— 'ज्वर वाला एक व्यक्ति भोज में चला गया। वहां विभिन्न मिष्ठान परोसे गए। जब ज्वर-ग्रस्त व्यक्ति ने खाना प्रारंभ किया तो प्रथम ग्रास में ही बोल उठा कि यह मिठाई तो कड़वी है।

पास में बैठे अन्य व्यक्तियों ने कहा— 'यह तो बहुत अच्छी मिठाई है। हमें तो इसमें कोई कड़वापन नहीं लगता।'

एक वैद्य ने उसकी नाड़ी देखते हुए कहा— 'तुम्हें ज्वर है। ज्वरी को अच्छी मिठाई भी स्वादहीन या कड़वी लगने लगती है।'

स्वामीजी ने कहा— 'जिसको मिथ्यात्व का ज्वर चढ़ा होता है, उसे संत अच्छे कैसे लग सकते हैं?'

एक व्यक्ति ने स्वामीजी से कहा— 'आपने ग्रंथों में शिथिलाचारी साधुओं के विषय में बहुत विवरण दिया है। उसे पढ़ने से मन में यह प्रश्न उठता है कि आपने यह सब कैसे जाना?'

स्वामीजी ने कहा— 'हम कार्तिक के ज्योतिषी हैं, आषाढ़ के नहीं। आषाढ़ में जो अन्न की उपज तथा भाव बतलाए जाते हैं, वे केवल भविष्यवाणी के रूप में होते हैं। मिल भी सकते हैं और नहीं भी। किंतु कार्तिक मास में जो अन्न की उपज एवं भाव बतलाए जाते हैं, वे भविष्य की बात न होकर वर्तमान की वास्तविकता से संबद्ध होते हैं। उसी तरह मैंने शिथिलाचार के विषय में जो लिखा है, वह सब वर्तमान के निकट-दर्शन और अनुभव के आधार पर है। कल्पना का उसमें कोई समावेश नहीं है।'

*कायर क्षत्रिय*

कईयों की मान्यता थी कि विशिष्ट कारण में साधु अकल्पनीय आहार आदि भी ले सकता है। ऐसा दान देने वाले को भी वे अल्प पाप और बहु निर्जरा करने वाला कहते थे।

स्वामीजी ने उस मान्यता पर प्रहार करते हुए कहा— 'कारण के नाम से जो अशुद्ध वस्तु लेने तथा देने की स्थापना करते हैं, वे शुद्ध साधु नहीं हो सकते। वे तो उस क्षत्रिय के समान होते हैं, जो बातें तो वीरता की बनाता है, किंतु युद्ध प्रारंभ होते ही भाग खड़ा होता है। ऐसे कायर व्यक्ति न कोई राज-सम्मान पा सकते हैं और न सुयश। उसी तरह ऐसे शिथिल साधु भी साधना-क्षेत्र में न कोई महत्त्व पा सकते हैं और न कोई आत्म-कल्याण ही कर सकते हैं।'

*अनेक साधु और आचार्य अपने श्रावकों को स्वामीजी के पास जाने का त्याग करवा दिया करते थे...?* जानेंगे... समझेंगे... और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में क्रमशः...

प्रस्तुति-- 🌻 संघ संवाद 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

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'सम्बोधि' का संक्षेप रूप है— सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र। यही आत्मा है। जो आत्मा में अवस्थित है, वह इस त्रिवेणी में स्थित है और जो त्रिवेणी की साधना में संलग्न है, वह आत्मा में संलग्न है। हम भी सम्बोधि पाने का मार्ग प्रशस्त करें आचार्यश्री महाप्रज्ञ की आत्मा को अपने स्वरूप में अवस्थित कराने वाली कृति 'सम्बोधि' के माध्यम से...

🔰 *सम्बोधि* 🔰

📜 *श्रृंखला -- 40* 📜

*अध्याय~~3*

*॥आत्मकर्तृत्ववाद॥*

💠 *भगवान् प्राह*

*13. आत्मा कर्ता स एवास्ति, भोक्ता सोऽपि च घातकः।*

*सुखदो दुःखदो सैष, निश्चयाभिमतं स्फुटम्।।*

भगवान ने कहा— सुख-दुःख का कर्ता आत्मा है। वही भोक्ता है। वही सुख-दुःख का अंत करनेवाला है और वही सुख-दुःख को देनेवाला है। यह निश्चय नय का अभिमत है।

*14. शरीरप्रतिबद्धोऽसौ, आत्मा चरति सन्ततम्।*

*सकर्मा क्वापि सत्कर्मा, निष्कर्मा क्वापि संवृतः।।*

यह आत्मा शरीर में आबद्ध है— कर्म शरीर के द्वारा नियंत्रित है। कर्मों के द्वारा ही यह सतत भव-भ्रमण करता है। यह कर्म-वर्गणा का आकर्षण करता है, इसलिए सकर्मा है। यह क्वचित् पुण्यकर्म भी करता है, इसलिए सत्कर्मा है। यह क्वचित् कर्म का निरोध भी करता है, इसलिए निष्कर्मा है।

*15. कुर्वन कर्माणि मोहेन, सकर्मात्मा निगद्यते।*

*अर्जयेदशुभं कर्म, ज्ञानमाव्रियते ततः।।*

मोह के उदय से जो व्यक्ति कर्म-प्रवृत्ति करता है, वह सकर्मात्मा कहलाता है। सकर्मात्मा अशुभ कर्म का बंधन करता है और उससे ज्ञान आवृत होता है।

*16. आवृतं दर्शनं चापि, वीर्यं भवति बाधितम्।*

पौद्गलिकाश्च संयोगाः, प्रतिकूलाः प्रसृत्वराः।।*

अशुभ कर्म के बंधन से दर्शन आवृत होता है, वीर्य का हनन होता है और प्रसरणशील पौद्गलिक संयोगों की अनुकूलता नहीं रहती।

*17. उदयेन च तीव्रेण, ज्ञानावरणकर्मणः।*

*उदयो जायते तीव्रो, दर्शनावरणस्य च।।*

*18. तस्य तीव्रोदयेन स्यात्, मिथ्यात्वमुदितं ततः।*

*अशुभानां पुद्गलानां, संग्रहो जायते महान्।।*

*(युग्मम्)*

ज्ञानावरण कर्म के तीव्र उदय से दर्शनावरण कर्म का तीव्र उदय होता है। दर्शनावरण के तीव्र उदय से मिथात्व– दृष्टि की विपरीतता का उदय होता है और उससे अशुभ कर्म-वर्गणा का महान् संग्रह होता है।

*आत्मा की विकृति का मूल हेतु है— मोहकर्म। अज्ञान और अदर्शन विकार के हेतु नहीं... मोहनिय कर्म की प्रधानता। मोहनिय के क्षय होने पर अन्य कर्मों के क्षय की अनिवार्यता...* समझेंगे और प्रेरणा पाएंगे... आगे के श्लोकों में... हमारी अगली श्रृंखला में... क्रमशः...

प्रस्तुति- 🌻 *संघ संवाद* 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

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जैन धर्म के आदि तीर्थंकर *भगवान् ऋषभ की स्तुति* के रूप में श्वेतांबर और दिगंबर दोनों परंपराओं में समान रूप से मान्य *भक्तामर स्तोत्र,* जिसका सैकड़ों-हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन श्रद्धा के साथ पाठ करते हैं और विघ्न बाधाओं का निवारण करते हैं। इस महनीय विषय पर परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की जैन जगत में सर्वमान्य विशिष्ट कृति

🙏 *भक्तामर ~ अंतस्तल का स्पर्श* 🙏

📖 *श्रृंखला -- 128* 📖

*गुणों की माला पहनें*

गतांक से आगे...

इस श्लोक में आचार्य मानतुंग द्वारा भय के आठ कारणों का उपसंहार किया गया है—

*मत्तद्विपेन्द्रमृगराजदावानलाहिः-*

*संग्रामवारिधिमहोदरबंधनोत्थम्।*

*तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव,*

*यस्तावकं स्तवमिमं मतिमान धीते।।*

भय के आठ हेतु ये हैं—

*1.* हाथी का भय

*2.* सिंह का भय

*3.* दावानल का भय

*4.* सर्प का भय

*5.* युद्ध का भय

*6.* समुद्र का भय

*7.* जलोदर का भय

*8.* बंधन का भय

प्रस्तुत श्लोक में इन सबका उपसंहार कर मानतुंग कहते हैं— प्रभो! जो आदिनाथ भगवान् की स्तुति करता है, उसके लिए भय एक क्षण में नष्ट हो जाते हैं। स्तुतिकार ने बड़ी सुंदर कल्पना की है— भय कैसे चला जाएगा? भय स्वयं डर जाएगा। जो व्यक्ति आपका स्तवन करता है, आपका ध्यान करता है, डर भी उसके पास आने से डरता है। डर कहता है कि मैं वहां नहीं जा सकता। आपकी स्तुति से दूसरों को डराने वाला भी डर जाता है। वह दूर ही रहता है, पास में भी नहीं आता। जो मतिमान् मनुष्य आपके स्तवन का पाठ करता है, उसका अध्ययन करता है, उसका अध्येता है और बड़ी तन्मयता के साथ उसका पाठ करता है, वह भय रहित हो जाता है।

स्तोत्र पाठ की एक विधि होती है। यदि केवल शब्दों का उच्चारण है, न अर्थ का ज्ञान है और न अर्थ के प्रति तादात्म्य है तो जो मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। जिस शब्द का उच्चारण हुआ, पहले उसके अर्थ का ज्ञान होना चाहिए। स्थूल व्यवहार की बात से समझें। किसी बच्चे से कहा गया— गिलास लाओ। अगर वह गिलास शब्द का अर्थ नहीं जानता है तो गिलास कभी नहीं लाएगा। एक व्यक्ति जर्मन, रशियन या पेरिस भाषा को जानने वाला है, उसे कहा जाए— *उदकं आनय*– जल लाओ। वह सुनता रहेगा किंतु क्रिया नहीं होगी क्योंकि वह 'उदकं' का अर्थ ही नहीं जानता है। दो व्यक्तियों में लड़ाई हो गई। एक वाटर-वाटर कह रहा था और एक पानी-पानी कह रहा था। दोनों में झगड़ा हो गया। एक की भाषा को दूसरा नहीं जानता और दूसरे की भाषा को पहला नहीं जानता। पानी का अर्थ वाटर है और वाटर का अर्थ पानी है— यह न जानना संघर्ष का कारण बन गया। हम जब शब्द के अर्थ को नहीं जानते हैं तब जो सिद्ध करना चाहते हैं, उसमें कठिनाई पैदा होती है। पहली शर्त है— शब्द के अर्थ को समझें। अर्थ को जानने के बाद उसके साथ संबंध स्थापित करें। गिलास लाओ, यह शब्द सुना, शब्द के अर्थ को जान लिया। उसके बाद आदमी उठता नहीं है, हाथ में गिलास को उठाता नहीं है तो गिलास नहीं आएगी। गिलास को पाने के लिए उसके साथ संपर्क स्थापित करना होता है। सफलता तब मिलती है जब शब्द, अर्थ का ज्ञान और अभिन्नता की अनुभूति— ये तीनों होते हैं। शब्द का सही उच्चारण, अर्थ का ज्ञान और पाठ के साथ एकात्मकता— ये तीनों सफलता के लिए जरूरी हैं। जो मतिमान् मनुष्य है, जिसमें मनन है, जो कोरा सुनता नहीं है, कोरा पढ़ता नहीं है, जो मनन करता है, वह इन आठ प्रकार के भयों से अपने आप को मुक्त कर लेता है। यह अभय का मंत्र है।

*सबसे बड़ा भय व सबसे बड़ा अभय क्या है...? स्तोत्र की संपन्नता आचार्य मानतुंग किस काव्य के द्वारा कर रहे हैं...?* जानेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...

प्रस्तुति -- 🌻 संघ संवाद 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

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शासन गौरव मुनिश्री बुद्धमल्लजी की कृति वैचारिक उदारता, समन्वयशीलता, आचार-निष्ठा और अनुशासन की साकार प्रतिमा "तेरापंथ का इतिहास" जिसमें सेवा, समर्पण और संगठन की जीवन-गाथा है। श्रद्धा, विनय तथा वात्सल्य की प्रवाहमान त्रिवेणी है।

🌞 *तेरापंथ का इतिहास* 🌞

📜 *श्रृंखला -- 140* 📜

*आचार्यश्री भीखणजी*

*जीवन के विविध पहलू*

*13. तीखे आलोचक*

*खोटा सिक्का*

किसी व्यक्ति ने स्वामीजी से कहा— 'साधु चाहे कितना ही शिथिलाचारी क्यों न हो, गृहस्थ से तो अच्छा ही होता है।'

स्वामीजी ने उस को समझाते हुए उदाहरण दिया— 'एक व्यक्ति प्रभातकाल में ही एक पैसे का गुड़ लेने गया। दुकानदार ने तांबे के सिक्के को आदरपूर्वक सिर से लगाया और उसे शुभ 'बोहनी'– व्यवसाय का प्रारंभ माना।

दूसरे दिन उसी व्यक्ति ने उसी दुकान से एक रुपये की रेजगी मांगी। दुकानदार ने 'बोहनी' में आए उस चांदी के रुपए को भी आदरपूर्वक सिर से लगाया।

तीसरे दिन वही व्यक्ति उसी दुकान पर फिर रुपया भुनाने आया। दुकानदार बहुत प्रसन्न हुआ कि कल वाला ग्राहक आज फिर आया है। उसने रुपया हाथ में लेकर देखा, तो वह खोटा था। तांबे के पैसे पर चांदी का झोल चढ़ाया हुआ था। उसने उसको खोटे रुपये को फेंकते हुए कहा— 'बोहनी में ही तुमने अपशकुन करवा दिया।'

ग्राहक बोला— 'परसों तांबे का पैसा लाया था और कल चांदी का रुपया। उन दोनों को तुमने आदर से ग्रहण किया, तब आज अपशकुन क्यों मानते हो? इसमें तो तांबा और चांदी दोनों हैं।'

दुकानदार ने कहा— 'पिछले दोनों सिक्के अपने स्वरूप में सत्य थे, परंतु यह असत्य है। अंदर से तांबे का पैसा है, किंतु बाहर से रुपए का भ्रम पैदा करता है, अतः खोटा सिक्का है।'

उपसंहार में स्वामीजी ने कहा— 'पैसे के समान श्रावक, रुपए के समान साधु और खोटे रुपए के समान शिथिलाचारी साधुओं को समझना चाहिए। श्रावक और साधु तो अपने व्रत यथावत् पालते हैं, अतः प्रशंसनीय एवं आराधक होते हैं, किंतु शिथिलाचारी साधु व्रतों का भंग करता रहता है। इसलिए न प्रशंसनीय होता है और न आराधक। वह वेष से साधु होने पर भी लक्षण से तो गृहस्थ से भी गया-बीता होता है। उसे 'अधबसेरा'– अश्वतर कहना चाहिए। अश्वतर अर्थात् खच्चर, जो न घोड़ों की गणना में आता है और न गधों की। उसकी वह स्थिति निंदनीय ही कही जा सकती है, वंदनीय तो बिल्कुल नहीं।'

*बलात् की गई सती*

स्वामीजी के युग में अनेक व्यक्तियों ने साधु-वेष को उदरपूर्ति का साधन बना लिया था। कुछ व्यक्ति उनको भी साधु मानकर आदर देते और धर्म-रक्षा की आशा करते। स्वामीजी ने उनकी आलोचना करते हुए कहा— 'पति की मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी को मतान्ध लोगों ने सीढ़ी से बांधकर बलपूर्वक जला दिया। अज्ञ-जन प्रार्थना करने लगे— 'सती माता! हमारी रक्षा करना, 'तेजरा' (हर तीसरे दिन आने वाला ज्वर) दूर करना।' बलात की गई सती क्या रक्षा करेगी और क्या 'तेजरा' दूर करेगी?'

शिथिलाचारी साधु बलात् बनाई गई उस सती की कोटि के ही हैं। उनसे धर्म-रक्षा की तो आशा ही क्या की जा सकती है, जब वे अपनी गृहीत साधुता की भी रक्षा नहीं करते?'

*स्वामी भीखणजी कुछ व्यक्तियों को तो बहुत अच्छे लगते थे, परंतु कुछ व्यक्ति उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करते। इसका क्या कारण था...?* जानेंगे... समझेंगे... और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में क्रमशः...

प्रस्तुति-- 🌻 संघ संवाद 🌻

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Updated on 18.09.2019 20:51

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*^^^!_____उन्नयन_____!^^^*

आचार ◆ विचार ◆ व्यवहार ◆ संस्कार

*अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल*

*44वां राष्ट्रीय महिला अधिवेशन*

*16-17-18 सितम्बर 2019, कुम्बलगुडु, बेंगलुरु*

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🌈🌈 पावन सन्निधि: *आचार्य श्री महाश्रमणजी*

💧 अमृत पाथेय: *साध्वीप्रमुखाश्री कनक प्रभाजी*

💦 *● गुरुवरो धम्म-देसणं "............●*

🉑 *मुख्य प्रवचन कार्यक्रम* की झलकियां

⏺ *दिनांक -* 18 सितम्बर 2019

⛲⛲ प्रसारक ~ *संघ संवाद* ⛲⛲

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आचार्य तुलसी महाप्रज्ञ

चेतना सेवा केन्द्र,

कुम्बलगुड़ु,

बेंगलुरु,


महाश्रमण चरणों मे

📮

: दिनांक:

18 सितम्बर 2019

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: प्रस्तुति:

🌻 *संघ संवाद* 🌻

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