04.11.2017 ►Media Center Ahinsa Yatra ►News

Posted: 04.11.2017
Updated on: 15.11.2017
2017.11.04 Kolkata Chaturmas 20 2017.11.04 Kolkata Chaturmas 27 2017.11.04 Kolkata Chaturmas 17 2017.11.04 Kolkata Chaturmas 16 2017.11.04 Kolkata Chaturmas 12

News in Hindi:

अहिंसा यात्रा प्रेस विज्ञप्ति

मंगल भावना समारोह: भावनाओं के ज्वार में बह गए धैर्य और संयम

  • अपने आराध्य को विदाई देने के नाम से ही कोलकातावासियों हृदय हुए द्रवित, बह उठे नयनों अश्रुधार
  • शब्द हुए मूक तो नम आंखों ने कही बात, सबकी एक थी गुहार, हमें अनाथ न करो नाथों के नाथ
  • समताधारी आचार्यश्री ने पावन पाथेय के साथ दिया मंगल आशीष से किया आच्छादित
  • कहा दी गई प्रेरणाओं को उतार अपने जीवन को बनाएं उन्नत
  • आचार्यश्री ने ठाणं, तेरापंथ प्रबोध, राजा प्रदेशी आख्यान के सम्पन्नता की घोषणा
  • साध्वीप्रमुखाजी ने दी पावन प्रेरणा, कहा ज्ञान को अपने जीवन में उतार अगली पीढ़ी को सुधारने का हो प्रयास

 

04.11.2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)ः

कहते हैं भावनाओं का ज्वार जब उमड़ता है तो वह अपने साथ सबकुछ बहा ले जाता है। धैर्य, संयम, ज्ञान, विज्ञान, सहनशीलता सबकुछ उस ज्वार में बहते चले जाते हैं और शेष रहता है तो केवल और केवल भावनाओं को वेग और उसकी तरलता। ऐसे ही भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा था राजरहाट स्थित महाश्रमण विहार के अध्यात्म समवसरण में जहां। जहां भक्तों की भावनाओं को ज्वार अपने आराध्य के समक्ष इस तरह उमड़ा मानों वह अपने साथ ज्ञान-विज्ञान, संयम, धैर्य सभी बहते नजर आए और रह गई केवल अश्रुपूरित आंखें, कंठों में फंसे कुछ स्वर और शब्द।

लगभग 58 वर्षों बाद कोलकातावासियों की प्यास को बुझाने के लिए अपने साथ ज्ञानगंगा की अविरल धारा और श्वेत रश्मियों की आभा के साथ लगभग चार महीने पूर्व जब जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी

आचार्यश्री महाश्रमणजी अहिंसा यात्रा के साथ कोलकाता के राजरहाट स्थित महाश्रमण विहार में पधारे तो मानों यह कोलकाता महानगर का नया तीर्थस्थल बन गया। इस परिसर से नियमित रूप से बहने वाली ज्ञानगंगा ने कितने पापग्रस्त, मलिन और कलुषित आत्माओं को निर्मल बनाते हुए पूरी दुनिया को मानवता का संदेश देने वाली थी। ऐसी ज्ञानगंगा के प्रवाहक आचार्यश्री महाश्रमणजी का देखते-देखते कैसे चतुर्मासकाल सम्पन्न हो गया, यह उन भक्तों को पता ही नहीं चला जो इसमें पूरी तरह डूब चुके थे।

उन्हें तो मानों दिन-रात अपने आराध्य के वचनामृत के श्रवण, दर्शन और उपासना की ऐसी लत लगी वो बाहरी दुनिया को ही भूल गए। अब तक चतुर्मासकाल की सम्पन्नता के बाद उन्हें अहसास हुआ कि अब तो हमारे आराध्य हमशे विदाई लेकर आगे प्रस्थान करेंगे तो मानों वे उस मछली की तरह तड़प उठे जो बिना पानी के सूखे में तड़प उठती है।

चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के विभिन्न अंगों और विभागों के पदाधिकारी से लेकर कार्यकर्ता और आम नागरिक तक अपनी भावनाओं की उठते ज्वार को मन में समेटे पहुुंच गए अध्यात्म समवसरण में और एक अलौकिक दृश्य उत्पन्न हो गया। एक ओर जन-जन का कल्याण करने वाले समताधारी, महामानव आचार्यश्री महाश्रमणजी तो दूसरी ओर अपनी सुधबुध खो चुकी कोलकाता की वह जनता जो अपने आराध्य के बिछड़ने मात्र की कल्पना से प्रकंपित हो चुकी थी। सर्व प्रथम कोलकाता महिला मंडल की सदस्याओं द्वारा गीत का संगान हुआ। उसके उपरान्त कोलकाता चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री कमल दूगड़ ने अपनी करुणा भरी वाणी से हृदयोद्गार व्यक्त करना आरम्भ किया तो कई बार कंठ अवरोधित हुए, भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए नयन भी सजल हुए, किन्तु उन्होंने अपने आराध्य के आगे की मंगल यात्रा के लिए मंगल कामना की।

तत्पश्चात ममतामयी तेरापंथ धर्मसंघ की असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने ममतामयी वाणी से कोलकातावासियों को अभिसिंचन प्रदान करते हुए कहा कि जब कोलकाता की धरती पर आचार्यश्री का आगमन हुआ था तो कोलकातावासियों का सपना साकार हो गया और आचार्यप्रवर के आने से यह महाश्रमण विहार गुलजार हो गया था। कल तक जिन लोगों के मन में अपने आराध्य को पाकर उत्साह, उमंग, उल्लास था आज उसी मन में पीड़ा हो रही है। उन्होंने प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आचार्यश्री से प्राप्त हुए संदेशों को अपने जीवन में उतार कर अपने जीवन को अच्छा बनाने के साथ-साथ अपनी भावी पीढ़ी को भी अच्छा बनाने का प्रयास करें तो आचार्यश्री का यह चतुर्मासकाल और अधिक सार्थक हो सकेगा। कोलकातावासी अपने आराध्य के वचनों को हृदयगंम कर लें तो मानों कुछ अंशों में उनके आराध्य सदा के लिए उनके पास रह जाएंगे।

मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भाव विह्वल भक्तों को अपनी चतुर्मासस्थल के अध्यात्म समवसरण इस चतुर्मास की अंतिम प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि ज्ञान की वृद्धि का एक साधन स्वाध्याय को कहा गया है। निरंतर स्वाध्याय करने से ज्ञान वृद्धिंगत होता है और पुष्ट भी होता है। जैन दर्शन में स्वाध्याय को बहुत महत्त्व दिया गया है। साधु के लिए तो दिन के आठ प्रहरों में चार प्रहर स्वाध्याय करने के लिए बताया गया है। स्वाध्याय से आलोक मिलता है। स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं है। इस स्वाध्याय के ठाणं आगम में पांच प्रकार बताए गए हैं। इसका पहला प्रकार है वाचना। आचार्य अपने शिष्यों को वाचना दे, पढ़ाए तो यह भी स्वाध्याय है। शिष्य भी विनयपूर्वक ज्ञान ग्रहण करे तो अपने जीवन का विकास कर सकता है। स्वाध्याय का दूसरा प्रकार तक्षना, तीसरा प्रकार परिवर्तना जिसके द्वारा ज्ञान मजबूत होता है। चैथा प्रकार अनुप्रेक्षा, जिसके द्वारा पढ़े हुए पर चिंतन कर ज्ञान की गहराई तक जाने का प्रयास करना और पांचवां प्रकार है धर्म चर्चा। जो आदमी प्राप्त करे, उसे औरों में बांटने का प्रयास करे। इन पांचों का आदमी अपने जीवन में सम्यक् अनुशीलन करे तो ज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है। आचार्यश्री ने चतुर्मास प्रवास स्थल की भूमि और प्रवचन स्थल को स्वाध्याय भूमि के रूप में संबोधित किया और कहा कि कुल मिलाकर यह चतुर्मास अच्छा रहा।

आचार्यश्री ने राजा प्रदेशी के आख्यान को पूर्ण किया। इस चतुर्मास के दौरान ठाणं आगम, तेरापंथ प्रबोध और राजा प्रदेशी आख्यान की सम्पन्नता की घोषणा की और कोलकातावासियों पर अपने स्नेहिल आशीर्वाद का अभिसिंचन प्रदान करते हुए कहा कि कोलकातावासियों में धर्म का प्रभाव लंबे समय तक बना रहे तो चतुर्मास की सफलता और अधिक हो सकेगी। लोगों के जीवन में खूब शांति बनी रहे, धार्मिकता का विकास हो।

आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद और आशीष को प्राप्त करने के उपरान्त भक्त अपने आराध्य से बिछड़ने के असह्य होती जा रही वेदना को छिपा नहीं पा रहे थे और सभी बारी-बारी से अपने आराध्य के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। इस क्रम मंे विकास परिषद के सदस्य श्री बनेचंद मालू, चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति की महामंत्री श्रीमती सूरज बरड़िया, श्री भंवरलाल बैद, श्री सुरेन्द्र बोरड़, श्री तुलसी दूगड़, श्री प्रकाश बैद, श्री विमल दूगड़, श्री नरेन्द्र मणोत, श्री विजयसिंह चोरड़िया, श्री नरेन्द्र बरड़िया, भी भिखमचंद पुगलिया, श्री सुरेन्द्र दूगड़, श्रीमती मधु दूगड़, श्री विजय बावलिया, श्री हेमंत दूगड़, श्री अमरचंद दूगड़, श्रीमती शोभा दूगड़, श्री जयकरण बच्छावत, श्री नवरतन बोथरा, श्री मनोज दूगड़ व श्री अभिषेक दूगड़ ने अपनी भावांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का संचालन श्री विनोद बैद ने किया।



English [Google Translate]

Non-violence travel press release

Mars Spirit Function: Patience and restraint in the tide of emotions

  • Collected by the name of giving farewell to your adoration, the heart becomes fluid, flowing nuns,
  • When the mute was silent, the naked eye said, one thing was the one, do not make us orphan natha nath
  • Sammatari Acharyashri has done the mantra with the holy path
  • Keep your inspired life out of the given inspirations
  • Acharyashree announced the prosperity of Thanan, Terapanth Prabodh, Raja Satiya Sakhan
  • Savidiprakushji gave the holy inspiration, said that the effort to improve the next generation of the knowledge that is going down in your life
     

04.11.2017 Rajarhat, Kolkata (West Bengal):


It is said that when a tide of emotions arises, then he sheds everything with himself. Patience, restraint, knowledge, science, tolerance, everything goes away in that tide and the rest remains only if only emotions and velocity and its liquidity The tide of such emotions was exacerbated in the spirituality of Mahasamana Vihar in Rajarhat, where Where the tide of the devotees felt like this before his admiration, as if he looked with wisdom, restraint, patience, and all of them were left with only tears of eyes, some tone and words stranded in the throats.

After about 58 years, to quench the thirst of the Calcuttians, with them, about four months before the Jivan Shvetambar Teerapanth Dharmasangha's Ekadshamadhyasa, representative of Lord Mahavira, unbroken Parivrajak:

Acharyashree Mahasramanji came in Mahasamana Vihar in Rajarhat, Kolkata with ahimsa yatra, so it became a new pilgrim center of Kolkata metropolis. Regularly flowing from this premises, DnyanGanga was about to give the message of humanity to the entire world by making so many sinful, dirty and self-centered souls clean. The observation of Acharyashri Mahasramanji, the conductor of such a DnyanGanga, was completed in the fourth year, it was not known to those devotees who were completely submerged in it.

He used to get such a sense of hearing, philosophy and worship of his devotional day and night that he forgot the outer world. So far after the prosperity of Chaturmasal, they realized that nowadays, our devotees will depart for the farewell and then they will feel like the fish, who suffer in drought without any water.

From the various parts of the Chaturmas migration arrangement committee, from the office-bearers of the departments to the workers and the common citizen, the rising tide of their emotions has come to mind and a supernatural scene has arisen in spirituality. On the one hand, the Samataadhar, the great welfare of the people, Acharyashri Mahasraman, on the other hand, the people of Kolkata, who had lost their sense of well-being, were shaken by the imagination of their disobedience. First of all, the songs of song by the members of the Kolkata Women's Board. After that, Mr. Kamal Dugad, President of the Kolkata Chaturmas Migration Order Committee started expressing heartbeat with his gracious voice; sometimes the throats were blocked, Nayan also got energized to express his emotions, but he went ahead ahead of his admiral's mangal yatra Mangal wished for.

Thereafter, the extraordinary Sadhvi Pramukhjaji of Mamtamayi Terapanth Dharmasangi, giving congratulations to the people of Mamtamayi Vani, said that when Acharyashree arrived on the land of Kolkata, the dreams of the Kolkataites came to an end and this Mahasamam Vihar was buzzing with the arrival of Acharya Prasar. People who had their enthusiasm, gusto, and glee in the mind, till yesterday, are suffering in the same mind today. While giving inspiration, he said that this four-year period of Acharyashree will be more meaningful if efforts are made to bring the messages received from Acharyashree into making his life better and also trying to make his future generations good. If the Calcuttais congratulate the words of their adherents, then in some parts they will remain with them for their adornment forever.

Offering the last inspiration of this Chaturmas, the teacher of the humanity, Acharyashri Maha Swamiji, said that the devotees of the devotees were given the ultimate inspiration of their Chaturmasasthal. Continuous self-discipline increases knowledge and is also affirmative. Swadhyay has been given great importance in Jain philosophy. For the sadhu, it has been told to do four Prahar Swadhyayas in eight days of the day. Swaadhayya gives light from. There is no ascetic similar to Swadhyaya. Five types have been described in the form of this Swadhyaya in Agam. Its first type is reading If the teacher teaches his disciples, then it is also a self-study. If the disciple too wisely acquires knowledge, he can develop his life. The second type of self-study is Teksana, the third type transforms through which the knowledge is strong. Chatha type infertility, by which contemplating on reading, trying to reach the depth of knowledge and the fifth type is religion discussion. The person who receives, try to distribute it to others. If the man of these five is able to follow him in his life, then he can move forward in the field of knowledge. Acharyashree addressed the land and discourse site of Chaturmas migration site as Swadhyaya land and said that the fourth quadruped was good.

Acharyashree completed the saga of Raja Rajya. During this Chaturmas, Thanan Agam, Terapanth Prabodh and Raja Pradhan announced the affluence of the narrative and giving a convergence of their affectionate blessings on the people of Calcutta, said that the success of Chaturmas could be more if the influence of religion in the Calcutta remained for a long time. There will be plenty of peace in the lives of people, religiousness will develop.

After receiving the blessings and blessings from Acharyashree, the devotees were not able to hide the harsh pain of separation from their adoration and all of them alternately gave their brother-in-law to their adversary. In this order, members of the development council, Shri Bechchand Malu, Smt. Suraj Baradiya, Shri Bhanwarlal Baid, Shri Surendra Borad, Sri Tulsi Dugad, Shri Prakash Baid, Shri Vimal Dugad, Shri Narendra Manot, Shri Vijay Singh Chordia, Shri. Narendra Baradiya, also Bhikhamchand Pugalia, Shri Surendra Dugad, Smt. Madhu Dugad, Mr. Vijay Bawalia, Mr. Hemant Dugar, Mr. Amarchand Dugar, Sh. Rimti Soba Dugd, Mr. Jaykrn Bchchhawat, Mr. Nvrtn Bothra, Mr. Manoj Dugd and Mr. Abhishek Dugd has paid Bawanjli. The program was run by Mr. Vinod Baid.

 

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