Chobisi ►14 ►Stavan for Bhagwan Anantanatha

Posted: 07.04.2016
Updated on: 09.04.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji
Acharya Jeetmal
 

Language: Rajasthani:
 

14~~ तीर्थंकर अनन्त प्रभु

पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भलां जी कांई।।

अनंत नाम -जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण।
भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण।।१।।

जिन चक्री सूर जुगलिया रे, वासुदेव बलदेव।
पंचम गुण पावै नहीं रे, ए रीत अनादि स्वमेव।।२।।

संजम लिधौ तिण समै रे, आया सप्तम गुणठाण ।
अन्तर्मुहूर्त तिंहा रही रे, छठे बहुस्थिति जाण।।३।।

आठमा थी दोय श्रेणि छै रे, उपशम क्षपक पिछाण।
उपशम जाय इग्यारमे रे, मोह दबावतो जाण।।४।।

श्रेणि उपशम जिन नां लहै रे, खपक श्रेणि धर खंत।
चारित्र मोह खपावंता रे, चढ़िया ध्यान अत्यंत।।५।।

नवमे आदि संजल चिहुं रे, अन्त समे इक लोभ।
दसमे सूक्षम मात्र ते रे, सागार उपयोग सोभ।।६।।

एकादशम उलंघ नै रे, बारमे मोह खपाय।
त्रिकर्म इक सम तोड़तां रे, तेरम केवल पाय।।७।।

तीर्थ थाप जोग रुंध नै रे, चवदमां थी शिव पाय।
उगणीसै पुनम भाद्रवी रे, अनंत रट्या हरषाय।।८।।

 

Lord Anantnath
Bhagwan Anantanatha

Falcon
Symbol - Falcon


 

 

 

 

14

Stavan for Bhagwan Anantanatha

 

Acharya Tulsi

6:37

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

4:02

Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

अर्थ~~14~~तीर्थंकर अनन्त प्रभु

प्रभो! तुमने शुद्ध ओर निर्मल ध्यान करके अर्हत् -पद पा लिया।

अनन्तनाथ प्रभो! चतुर्थ गुणस्थान में तुम द्रव्य (भावी) तीर्थंकर थे।वास्तव में तीर्थकर तेरहवें गुणस्थान में होते है,उससे पहले द्रव्य तीर्थंकर होते हैा

अर्हत्,चक्रवर्ति,देव,यौगलिक मनुष्य,वासुदेव और बलदेव पांचवें गुणस्थान को प्राप्त नहीं करते।यह स्वयं संभूत अनादिकाल की रीति है।

तुमने जब संयम स्वीकार किया,उस समय तुमने सातवें गुणस्थान का आरोहण कर लिया। उसमें अन्तरमुहूर्त ठहर तुम छठे गुणस्थान में आ गये ।वहां लम्बे समय तक रहे।

आठवें गुणस्थान से दो श्रेणियां प्रारंभ होती है -उपशम और क्षपक।उपशम श्रेणी का आरोहण करने वाला मोह को दबाता हुआ ग्यारहवें गुणस्थान तक चला जाता है।

तीर्थंकर उपशम श्रेणी का आरोहण नहीं करते ।वे क्षपक श्रेणी का आरोहण करते हैं।तुम चारित्रमोह को क्षीण करते हुए ध्यान के उच्च सोपान पर आरूड़ हो गए।

नौवें गुणस्थान के प्रारंभ में चारों संज्वलन कषाय होते है ।उसके अन्तिम समय में केवल संज्वलन लोभ रहता है ।दशवें गुणस्थान में वह सुक्ष्ममात्रा में बचता है ।उस समय साकारोपयोग (ज्ञानात्मक चेतना)ही होता है ।

ग्यारहवें गुणस्थान को लांघकर बारहवें में मोह को क्षीण कर ज्ञानावरण,दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन कर्मों को एक साथ तोड़ तेरहवें में तुमने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया ।

तीर्थ की स्थापना कर अब तुम वास्तविक तीर्थंकर बन गये और अन्त में योग (मन,वचन और शरीर की चंचलता) का निरोध कर चौदहवें गुणस्थान से मोक्ष को प्राप्त कर लिया ।मैंने हर्षित होकर तुम्हारी स्तवना की ।

रचनाकाल-वि.सं.१९००,भाद्रवी पूर्णिमा।

 

English Translation:

14th Tirthankara Anantnath.

Lord! You got the dignity of Arhat by practicing pure and vestal meditation.

Lord Anantnath! You were Dravya (prospective) Tirthankara in the fourth Gunsthan. Essentially Tirthankara become in thirteenth Gunsthan, before that they are known as Dravya Tirthankara.

Arahat, Chakravrati (An emperor in whose armoury a weapon Chakra appears predestined. He is also a type of divine personages), Devas, Yaugalik (a pair of boy and girl born as twins get married to each other, also gives birth to a pair of boy and girl as twins and dies together), Manushya (human being), Vasudev and Baldev (types of divine personages) do not get fifth Gunsthan. It is an aseity principle of immemorial period.

At the time when you accepted the path of asceticism, You have ascended the seventh Gunsthan. You stayed there for Antaramuhurta, after that you came in sixth Gunsthan, where you stayed for a long time.

Two categories start from eighth Gunsthan - Upasham Shreni and Kshapak Shreni (category of abstinence). One who ascends on Upasham Shreni, goes till eleventh Gunsthan by oppressing the illusion.

Tirthankara never ascend on Upasham Shreni, they always ascend on Kshapak Shreni. You became mounted at the uppermost state of meditation by diminishing the Charitramoh Karma.

All the four Sanjwalan Kashayas lie at the beginning of ninth Gunsthan. At the ending period of this Gunsthan only Sanjwalan Lobh remains. In tenth Gunsthan it remains a bit. That time only cognitive consciousness exists.

You availed the Kevalgyana in the thirteenth Gunsthan by jumping over the eleventh Gunsthan, diminishing the rest Moh Karma and breaking down all three Karmas - Gyanavarniya Karma, Darshana-varana Karma and Antaraya Karma in the twelfth Gunsthan.

You have become the intrinsic Tirthankara by founding the Tirtha and ultimately, you got your desired destination Moksha from the fourteenth Gunsthan by restraining the Yoga (mobility of Manh, Vachana and Sharira). I have pleasantly recited you.

Time of Composing - V.S. 1900, Purnima (15th day) Bhadrava.

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Author

Source/Info

Project: Sushil Bafana
Text contributions:
Rajasthani & Hindi: Neeti Golchha
English: Kavita Bhansali