Chobisi ►02 ►Stavan for Bhagwan Ajitanatha

Posted: 17.03.2016
Updated on: 28.12.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji

Acharya Jeetmal

Language: Rajasthani:

2 ~तीर्थंकर अजित प्रभु

अहो प्रभु! तुम ही दायक शिवपंथ ना
अहो प्रभु!अजित जिनेश्वर आपरो,ध्याऊँ ध्यान हमेश हो।
अहो प्रभु! अशरण शरण तूं ही सही,मेटण सकल कलेश हो।।१।।

अहो प्रभु! उपशम रस भरी आपरी,वाणी सरस विशाल हो।
अहो प्रभु! मुगति-निसरणी मनोहरु,सुन्यां मिटे भ्रम जाल हो।।२।।

अहो प्रभु! उभय बंधण आप अखिया,राग-द्वेष विकराल हो।
अहो प्रभु! हेतु ए नरक निगोद नां, राच्या मूरख बाल हो ।।३।।

अहो प्रभु! रमणी राखसणी कही, विषबेली मोहजाल हो।
अहो प्रभु! काम-भोग किम्पाक-सा,दाख्या दीन-दयाल हो।।४।।

अहो प्रभु! विविध उपदेश देई करी, तें तारया नर नार हो।
अहो प्रभु! भव -सिंधु-पोत तूं ही सही,तूं ही जगत- आधार हो।।५।।

अहो प्रभु! शरण आयो तुझ साहिबा! बस रह्या हिया मांय हो।
अहो प्रभु! आगम -वयण अग्डोकरी,रह्यो ध्यान तुझ ध्याय हो।।६।।

अहो प्रभु! संवत उग्णिसै भाद्रवै,दसमी आदितवार हो।
अहो प्रभु! आप तणा गुण गाविया,वतर्या जै जै कार हो।।७।।

 

Lord Ajitnath

Bhagwan Ajitanatha

Elephant

Symbol - Elephant

 

 

 

 

02

Stavan for Bhagwan Ajitanatha

 

Acharya Tulsi

6:27

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

5:05


Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

{2 ~अर्थ}

प्रभो! मोक्ष का पथ दिखाने वाले तुम्ही हो।

प्रभो! अर्हत् अजित! मै प्रतिदिन तुम्हारा ध्यान करता हूँ।तुम्ही अशरण के शरण हो और तुम्ही हो सब सनक्लशों को दूर करने वाले।

प्रभो! तुम्हारी वाणी उपशम रस से भरी हुई, सरस और व्यापक है।वह मुक्ति जाने के लिए मनोहर निसैनी है।उसके श्रवण मात्र से भृम -जाल टूट जाता है।

प्रभो! तुमने दो प्रकार के बंधन बताये है-राग और द्वेष।ये दोनों ही भयावह तथा नरक और निगोद के हेतु है, फिर भी नासमझ और अज्ञानी लोग इनमे रचे-पचे रहते है।

प्रभो! तुमने कहा है-वासना,राक्षसी,विष-वल्ली और मोहजाल है।हे दीन दयाल! तुमने काम-भोग को किम्पाक फल के समान बताया है।

प्रभो! तुमने विविध प्रकार से उपदेश देकर जनता को तृष्णा के पार पहुँचाया है।तुम्ही भव-सिंधु में जलपोत हो और तुम्ही जगत के आधार हो।

प्रभो! में तुम्हारा शरणागत हूँ।तुम मेरे अन्तः करण में बसे हुए हो। मेने तुम्हे कभी देखा नहीं,पर मै आगम वचन को प्रमाण मान कर तुम्हारा ध्यान कर रहा हूँ।

प्रभो! मैने तुम्हारे गुणों का संगान किया ।इससे मेरे जीवन में जय जयकार हो रहा है।

{रचनाकाल वि. सं.१९००,भाद्रव शुक्ला दशमी,रविवार।}

 

English Translation:

2nd Tirthankara Bhagwan Ajitanatha


O Lord! you are the one who leads the path of Moksha.

O Lord! Ajitanatha! I cherish you everyday. You are the shelter for unassisted and only you who dispels all grievances.

Lord! Your heavenly voice is filled with  delight of solace, kind and universal. It is like an adorable step to reach on salvation and also Illusion get ruptured by listening this only.

Lord! You have told two types of hitch Raga and Dvesha. They both are terrific and cause Naraka - Nigoda (hell), still unwise and goofy people stay mingled and inhabited with these.

Lord! You preached fantasy is like witch, poison-volley and the trap of illusion. O Kind Hearted! You disclosed lust as a Kimpak Fal.

Lord! You have made people to cross craving by many preachments. You are like the hydroplane in this earthly concern and also the axis of this universe.

Lord! I am in your protection, you are cherished deeply in my conscience. I cherish you by bowing Agama precept. Though, I have never seen you.

Lord! I have chanted your merits, this is the reason of ovation in my life.


Time of Composing - V.S. 1900, 10th day of Shukla Bhadrava, Sunday.

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