03.09.2021: STGJG Udaipur - आत्म जागरण का पर्व है पर्यूषण - श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र / Paryushan is the Festival of Self Awakening - Shramana Dr. Pushpendra

Published: 03.09.2021
Updated: 03.09.2021
Previous Next

News in Hindi (English translation below)

आत्म जागरण का पर्व है पर्यूषण 
- श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र।

जैन धर्म में पर्यूषण पर्व का अत्यधिक महत्व है। पर्यूषण का अर्थ है स्वयं के निकट होना। परिधि से केंद्र की ओर लौटना। पऱिउषण, परि का मतलब है चारों ओर से, उषण का अर्थ है दाह। जिस पर्व में कर्मों का दाह यानी विनाश किया जाए, वह पर्यूषण है। सभी अवगुणों को दूर कर अंतर ज्योति को जगाने की साधना में संलग्न रहना ही पर्यूषण है।
आत्म-मंथन - पर्यूषण शुद्ध रूप से आध्यात्मिक पर्व है। इसमें आत्म-निरीक्षण, आत्म-चिंतन ही नहीं, आत्म-मंथन की प्रक्रियाएं भी निहित हैं। इसमें भौतिक साधनों के उपभोग का कोई स्थान नहीं है। यह भाद्रपद महीने में मनाया जाता है। मल्लिनाथ पुराण के अनुसार, भादो सभी माहों में सम्राट के समान है। इस दौरान प्रत्येक गृहस्थ के मन में सहज ही त्याग, तपस्या, दर्शन, पूजन, भजन आदि की भावना उत्पन्न होती है। जैन परंपरा के अनुसार, यह पर्व भादो, माघ और चौत्र महीने में शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक वर्ष में तीन बार, लेकिन भाद्रपद में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। जैन धर्म के दिगंबर और श्वेतांबर, दोनों संप्रदाय यह पर्व मनाते हैं। श्वेतांबर समाज केवल 8 दिन और दिगंबर समाज पूरे 10 दिन पयूर्षण पर्व मनाता है।

महाकुंभ है पर्युषण
पर्युषण महापर्व मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है। पूरे विश्व के लिए यह एक उत्तम और उत्कृष्ट पर्व है, क्योंकि इसमें आत्मा की उपासना की जाती है। संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। 

जैन धर्म की त्याग प्रधान संस्कृति में पर्युषण पर्व का अपना अपूर्व एवं विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। यह एकमात्र आत्मशुद्धि का प्रेरक पर्व है इसीलिए यह पर्व ही नहीं, महापर्व है। जैन लोगों का सर्वमान्य विशिष्टतम पर्व है। पर्युषण पर्व- जप, तप, साधना, आराधना, उपासना, अनुप्रेक्षा आदि अनेक प्रकार के अनुष्ठानों का अवसर है।

पर्युषण पर्व अंतरात्मा की आराधना का पर्व है, आत्मशोधन का पर्व है, निद्रा त्यागने का पर्व है। सचमुच में पर्युषण पर्व एक ऐसा सवेरा है, जो निद्रा से उठाकर जागृत अवस्था में ले जाता है। अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाता है। 

तो जरूरी है प्रमादरूपी नींद को हटाकर इन 8 दिनों विशेष तप, जप, स्वाध्याय की आराधना करते हुए अपने आपको सुवासित करते हुए अंतरात्मा में लीन हो जाएं जिससे हमारा जीवन सार्थक व सफल हो पाएगा।

'पर्युषण' पर्व का शाब्दिक अर्थ है- आत्मा में अवस्थित होना। परि उपसर्ग व वस् धातु इसमें अन् प्रत्यय लगने से पर्युषण शब्द बनता है। पर्युषण यानी ‘परिसमन्तात-समग्रतया उषणं वसनं निवासं करणं’। पर्युषण का एक अर्थ है- कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी अतः यह पर्युषण पर्व आत्मा का आत्मा में निवास करने की प्रेरणा देता है।

पर्युषण महापर्व आध्यात्मिक पर्व है, इसका जो केंद्रीय तत्व है, वह है- आत्मा। आत्मा के निरामय, ज्योतिर्मय स्वरूप को प्रकट करने में पर्युषण महापर्व अहं भूमिका निभाता रहता है। अध्यात्म यानी आत्मा की सन्निकटता। यह पर्व मानव-मानव को जोड़ने व मानव हृदय को संशोधित करने का पर्व है, यह मन की खिड़कियों, रोशनदानों व दरवाजों को खोलने का पर्व है।

पर्युषण पर्व जैन एकता का प्रतीक पर्व है। जैन लोग इसे सर्वाधिक महत्व देते हैं। संपूर्ण जैन समाज इस पर्व के अवसर पर जागृत एवं साधनारत हो जाता है। दिगंबर परंपरा में इसकी ‘दशलक्षण पर्व’ के रूप में पहचान है। उनमें इसका प्रारंभिक दिन भाद्र व शुक्ला पंचमी और संपन्नता का दिन चतुर्दशी है।

दूसरी तरफ श्वेतांबर जैन परंपरा में भाद्र व शुक्ला पंचमी का दिन समाधि का दिन होता है जिसे संवत्सरी के रूप में पूर्ण त्याग-प्रत्याख्यान, उपवास, पौषध सामायिक, स्वाध्याय और संयम से मनाया जाता है।

वर्षभर में कभी समय नहीं निकाल पाने वाले लोग भी इस दिन जागृत हो जाते हैं। कभी उपवास नहीं करने वाले भी इस दिन धर्मानुष्ठान करते नजर आते हैं।

पर्युषण पर्व मनाने के लिए भिन्न-भिन्न मान्यताएं उपलब्ध होती हैं। आगम साहित्य में इसके लिए उल्लेख मिलता है कि संवत्सरी चातुर्मास के 49 या 50 दिन व्यतीत होने पर व 69 या 70 दिन अवशिष्ट रहने पर मनाई जानी चाहिए। दिगंबर परंपरा में यह पर्व 10 लक्षणों के रूप में मनाया जाता है। ये 10 लक्षण पर्युषण पर्व के समाप्त होने के साथ ही शुरू होते हैं।

पर्युषण महापर्व कषाय शमन का पर्व है। यह पर्व 8 दिनों तक मनाया जाता है जिसमें किसी के भीतर में ताप, उत्ताप पैदा हो गया हो, किसी के प्रति द्वेष की भावना पैदा हो गई हो तो यह उसको शांत करने का पर्व है। धर्म के 10 द्वार बताए हैं उसमें पहला द्वार है- क्षमा। क्षमा यानी समता। क्षमा जीवन के लिए बहुत जरूरी है। जब तक जीवन में क्षमा नहीं, तब तक व्यक्ति अध्यात्म के पथ पर नहीं बढ़ सकता।

भगवान महावीर ने क्षमा यानी समता का जीवन जीया। वे चाहे कैसी भी परिस्थिति आई हो, सभी परिस्थितियों में सम रहे। ‘क्षमा वीरों का भूषण है’- महान व्यक्ति ही क्षमा ले व दे सकते हैं। पर्युषण पर्व आदान-प्रदान का पर्व है। इस दिन सभी अपनी मन की उलझी हुई ग्रंथियों को सुलझाते हैं, अपने भीतर की राग-द्वेष की गांठों को खोलते हैं, वे एक- दूसरे से गले मिलते हैं। पूर्व में हुई भूलों को क्षमा द्वारा समाप्त करते हैं व जीवन को पवित्र बनाते हैं।

पर्युषण महापर्व का समापन मैत्री दिवस के रूप में आयोजित होता है जिसे क्षमापना दिवस भी कहा जाता है। इस तरह से पर्युषण महापर्व एवं क्षमापना दिवस- ये एक-दूसरे को निकटता में लाने का पर्व है। ये एक-दूसरे को अपने ही समान समझने का पर्व है। गीता में भी कहा है- 'आत्मौपम्येन सर्वत्रः, समे पश्यति योर्जुन’। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- 'हे अर्जुन! प्राणीमात्र को अपने तुल्य समझो।'

भगवान महावीर ने कहा- ‘मित्ती में सव्व भूएसु, वेरंमज्झण केणइ’। सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ वैर नहीं है।

मानवीय एकता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, मैत्री, शोषणविहीन सामाजिकता, अंतरराष्ट्रीय नैतिक मूल्यों की स्थापना, अहिंसक जीवन आत्मा की उपासना शैली का समर्थन आदि तत्व पर्युषण महापर्व के मुख्य आधार हैं। ये तत्व जन-जन के जीवन का अंग बन सके, इस दृष्टि से इस महापर्व को जन-जन का पर्व बनाने के प्रयासों की अपेक्षा है।

मनुष्य धार्मिक कहलाए या नहीं, आत्मा-परमात्मा में विश्वास करे या नहीं, पूर्व जन्म और पुनर्जन्म को माने या नहीं, अपनी किसी भी समस्या के समाधान में जहां तक संभव हो, अहिंसा का सहारा ले- यही पयुर्षण की साधना का हार्द है। हिंसा से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। हिंसा से समाधान चाहने वालों ने समस्या को अधिक उकसाया है। इस तथ्य को सामने रखकर जैन समाज ही नहीं, आमजन भी अहिंसा की शक्ति के प्रति आस्थावान बनें और गहरी आस्था के साथ उसका प्रयोग भी करें।

नैतिकताविहीन धर्म, चरित्रविहीन उपासना और वर्तमान जीवन की शुद्धि बिना परलोक सुधार की कल्पना एक प्रकार की विडंबना है। धार्मिक वही हो सकता है, जो नैतिक है। उपासना का अधिकार उसी को मिलना चाहिए, जो चरित्रवान है। परलोक सुधारने की भूलभुलैया में प्रवेश करने से पहले इस जीवन की शुद्धि पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए। धर्म की दिशा में प्रस्थान करने के लिए यही रास्ता निरापद है और यही पर्युषण महापर्व की सार्थकता का आधार है।

पर्युषण पर्व प्रतिक्रमण का प्रयोग है। पीछे मुड़कर स्वयं को देखने का ईमानदार प्रयत्न है। वर्तमान की आंख से अतीत और भविष्य को देखते हुए कल क्या थे और कल क्या होना है इसका विवेकी निर्णय लेकर एक नए सफर की शुरुआत की जाती है। पर्युषण आत्मा में रमण का पर्व है, आत्मशोधन व आत्मोत्थान का पर्व है। यह पर्व अहंकार और ममकार के विसर्जन करने का पर्व है। यह पर्व अहिंसा की आराधना का पर्व है। आज पूरे विश्व को सबसे ज्यादा जरूरत है अहिंसा की, मैत्री की। यह पर्व अहिंसा और मैत्री का पर्व है।

अहिंसा और मैत्री द्वारा ही शांति मिल सकती है। आज जो हिंसा, आतंक, आपसी-द्वेष, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार जैसी ज्वलंत समस्याएं न केवल देश के लिए बल्कि दुनिया के लिए चिंता का बड़ा कारण बनी हुई हैं और सभी कोई इन समस्याओं का समाधान चाहते हैं। उन लोगों के लिए पर्युषण पर्व एक प्रेरणा है, पाथेय है, मार्गदर्शन है और अहिंसक जीवन शैली का प्रयोग है।

आज भौतिकता की चकाचौंध में, भागती जिंदगी की अंधी दौड़ में इस पर्व की प्रासंगिकता बनाए रखना ज्यादा जरूरी है। इसके लिए जैन समाज संवेदनशील बने, विशेषतः युवा पीढ़ी पर्युषण पर्व की मूल्यवत्ता से परिचित हो और वे सामायिक, मौन, जप, ध्यान, स्वाध्याय, आहार संयम, इन्द्रिय निग्रह, जीवदया आदि के माध्यम से आत्मचेतना को जगाने वाले इन दुर्लभ क्षणों से स्वयं लाभान्वित हों और जन-जन के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत करे।

English translation (digitally translated)

Paryushan festival has great importance in Jainism. Paryushana means to be near oneself. Returning from the periphery to the center. Paiyushan, Pari means from all around, Ushana means burn. Paryushana is the festival in which the karma is burnt, that is, annihilated. Paryushana is to engage in the sadhana of awakening the inner light by removing all the demerits.

Atma-churning - Paryushan is a purely spiritual festival. It includes not only the processes of introspection, self-reflection, but also self-reflection. There is no place for the consumption of material resources in this. It is celebrated in the month of Bhadrapada. According to Mallinath Purana, Bhado is equal to the emperor in all the months. During this, the feeling of sacrifice, penance, darshan, worship, bhajan etc. naturally arises in the mind of every householder. According to Jain tradition, this festival is celebrated thrice a year from Panchami to Chaturdashi of Shukla Paksha in Bhado, Magha and Chautra months, but with special enthusiasm in Bhadrapada. Both Digambar and Shwetambar sects of Jainism celebrate this festival. Shwetambar society celebrates Payushan festival for only 8 days and Digambar society for full 10 days.

Mahakumbh is Paryushan
Paryushan Mahaparva is not just a festival of Jains, it is a universal festival. It is a great and excellent festival for the whole world, because the soul is worshiped in it. This is the only festival or festival in the whole world in which a person becomes self-realized by being self-absorbed and tries to attain salvation by climbing to the summit of supernatural, spiritual bliss.

The Paryushan festival has its own unique and special spiritual significance in the renunciation-oriented culture of Jainism. This is the only inspiring festival of self-purification, that is why it is not only a festival but a great festival. It is the most recognized festival of Jain people. Paryushan festival is an occasion for many types of rituals like chanting, austerity, sadhna, worship, worship, anupreksha etc.

Paryushan festival is the festival of worship of the soul, the festival of self-purification, the festival of giving up sleep. In fact, the Paryushan festival is such a dawn, which lifts us from sleep and takes us to the awakened state. Leads us from the darkness of ignorance to the light of knowledge.

So it is necessary to remove the sleep of madness, while doing special austerity, chanting, worshiping self-study, and engross yourself in the soul, so that our life will be meaningful and successful.

The literal meaning of the festival of 'Paryushan' is to be situated in the soul. The word Paryushana is formed by adding other suffixes to it with the prefix Pari and Vastu. Paryushana means 'Parisamantat-Samataya Ushanam Vasanam Nivasam Karanam'. One of the meanings of Paryushana is the destruction of karma. The enemies of Karma will be destroyed, only then the soul will be situated in its form, so this festival of Paryushan gives inspiration to the soul to reside in the soul.

Paryushan Mahaparva is a spiritual festival, the central element of it is the soul. Paryushan Mahaparva continues to play an ego role in revealing the pure, luminous form of the soul. Spirituality means the closeness of the soul. This festival is the festival of connecting human-human and modifying the human heart, it is the festival of opening the windows, skylights and doors of the mind.

Paryushan festival is the symbol of Jain unity. Jain people give utmost importance to it. The entire Jain society becomes awake and engaged in spiritual practice on the occasion of this festival. In the Digambar tradition, it is recognized as 'Dashlakshana Parva'. Among them, its initial day is Bhadra and Shukla Panchami and the day of prosperity is Chaturdashi.

On the other hand, in the Shwetambar Jain tradition, the day of Bhadra and Shukla Panchami is the day of Samadhi, which is celebrated in the form of Samvatsari with complete renunciation, fasting, medicinal sharing, self-study and abstinence.

Even people who are unable to take time out during the year also wake up on this day. Even those who never fast are seen performing rituals on this day.

Different beliefs are available for celebrating Paryushan festival. It is mentioned in the Agama literature that Samvatsari should be celebrated after 49 or 50 days of Chaturmas have elapsed and 69 or 70 days remaining. In the Digambara tradition, this festival is celebrated in the form of 10 signs. These 10 symptoms start with the end of Paryushan festival.

Paryushan Mahaparva is the festival of kashaya mitigation. This festival is celebrated for 8 days in which heat, turmoil has arisen in someone, if a feeling of hatred has arisen towards someone, then it is a festival to pacify him. The 10 gates of religion have been mentioned, in which the first door is forgiveness. Forgiveness means equality. Forgiveness is very important for life. Unless there is forgiveness in life, a person cannot progress on the path of spirituality.

Lord Mahavir lived a life of forgiveness i.e. equality. No matter what the situation may have come, he remained equal in all circumstances. "Forgiveness is the jewel of the brave" - ​​Only great people can take and give forgiveness. Paryushan festival is the festival of exchange. On this day everyone unravels the entangled glands of their mind, untie the knots of anger and hatred within them, they hug each other. Forgiveness eliminates the mistakes made in the past and makes life pure.

The end of Paryushan Mahaparva is held in the form of Friendship Day, which is also known as Forgiveness Day. In this way, Paryushan Mahaparva and Forgiveness Day - it is a festival to bring each other closer. It is a festival to treat each other as oneself. It is also said in the Gita - 'Atmaupamyen sarvatrah, same pashyati yorjuna'. Shri Krishna said to Arjuna- 'O Arjuna! Treat the animal as your equal.'

Lord Mahavir said- 'Savva bhuesu in mitti, veramjjhana kenai'. I have friendship with all beings, I have no enmity with anyone.

Human unity, peaceful co-existence, friendship, socialism without exploitation, establishment of international moral values, non-violent life, support of the worship style of soul etc. are the main basis of Paryushan Mahaparva. From this point of view, efforts are expected to make this great festival a festival of the people.

Whether a person is called religious or not, whether he believes in the soul-Parmatma or not, whether he believes in past birth and rebirth, whether he should resort to non-violence as far as possible in solving any of his problems - this is the heart of the sadhna of Payushan. Violence cannot be a permanent solution to any problem. Those seeking a solution through violence have only exacerbated the problem. Keeping this fact in front, not only the Jain society, but also the common people should become faithful in the power of non-violence and use it with deep faith.

Religion without morality, worship without character and the imagining of the hereafter reform without purification of the present life is a kind of irony. Religious can only be what is moral. The right to worship should be given to those who are of character. The focus should be on the purification of this life before entering the labyrinth of the hereafter. This is the safe way to proceed in the direction of Dharma and this is the basis of the significance of the festival of Paryushan.

Paryushan festival is the use of Pratikraman. It is a sincere effort to look back and look at yourself. Looking at the past and future through the eyes of the present, a new journey is started by taking a wise decision of what was yesterday and what is to be tomorrow. Paryushan is a festival of pleasure in the soul, a festival of self-purification and self-enhancement. This festival is the festival of immersion of ego and Mamkar. This festival is a festival of worship of non-violence. Today the whole world needs the most for non-violence, friendship. This festival is a festival of non-violence and friendship.

Peace can be found only through non-violence and friendship. Today, the burning problems like violence, terror, mutual hatred, Naxalism, corruption have become a big cause of concern not only for the country but for the world and everyone wants a solution to these problems. For those people, the festival of Paryushan is an inspiration, a path, a guidance and a practice of non-violent lifestyle.

Today in the glare of materialism, it is more important to maintain the relevance of this festival in the blind race of a running life. For this, Jain society should become sensitive, especially the younger generation should be aware of the value of Paryushan festival and they themselves benefited from these rare moments of awakening self-consciousness through sharing, silence, chanting, meditation, self-study, dietary restraint, sense control, soulfulness etc. Be and present an ideal in front of the people.

Sources
Shri Tarak Guru Jain Granthalaya Udaipur
Share this page on:
Page glossary
Some texts contain  footnotes  and  glossary  entries. To distinguish between them, the links have different colors.
  1. Agama
  2. Anger
  3. Bhadra
  4. Bhajan
  5. Chaturmas
  6. Darshan
  7. Dharma
  8. Digambar
  9. Digambara
  10. Fasting
  11. Gita
  12. Guru
  13. Jainism
  14. Karma
  15. Kashaya
  16. Krishna
  17. Mahavir
  18. Mallinath
  19. Meditation
  20. Non-violence
  21. Paryushan
  22. Paryushan Mahaparva
  23. Paryushana
  24. Pratikraman
  25. Sadhana
  26. Sadhna
  27. Samadhi
  28. Samvatsari
  29. Shri Tarak Guru Jain Granthalaya Udaipur
  30. Shukla
  31. Shwetambar
  32. Soul
  33. Udaipur
  34. Violence
  35. दर्शन
  36. महावीर
  37. लक्षण
  38. शिखर
  39. श्रमण
Page statistics
This page has been viewed 172 times.
© 1997-2021 HereNow4U, Version 4.45
Home
About
Contact us
Disclaimer
Social Networking

HN4U Deutsche Version
Today's Counter: