13.06.2018 ►SS ►Sangh Samvad News

Posted: 13.06.2018

Update

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जैनधर्म की श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा के आचार्यों का जीवन वृत्त शासन श्री साध्वी श्री संघमित्रा जी की कृति।

📙 *जैन धर्म के प्रभावक आचार्य* 📙

📝 *श्रंखला -- 350* 📝

*मनस्वी आचार्य माणिक्यनन्दी और नयनन्दी*

*साहित्य*

आचार्य माणिक्यनन्दी की साहित्यिक मेधा विलक्षण थी। वर्तमान में उनका परीक्षामुख नामक ग्रंथ उपलब्ध है। यह ग्रंथ न्याय साहित्य का अनुपम रत्न है। ग्रंथ का परिचय इस प्रकार है

*परीक्षामुख* यह जैन न्याय का आधारसूत्र ग्रंथ है। न्यायसूत्र, वैशेषिक सूत्र, मीमांसक सूत्र, ब्रह्मसूत्र, योगसूत्र, गृहसूत्र आदि इन सूत्रात्मक ग्रंथों में यह ग्रंथ महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस ग्रंथ के छह समुद्देश हैं। ग्रंथगत सूत्र संख्या 208 है। प्रथम समुद्देश के 13 सूत्र, द्वित्तीय समुद्देश के 12 सूत्र, तृतीय समुद्देश के 97 सूत्र, चतुर्थ समुद्देश के 9 सूत्र, पंचम समुद्देश के 3 सूत्र, तथा छठे समुद्देश के 74 सूत्र हैं। प्रथम पांच समुद्देश में प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रमाण की विस्तृत चर्चा है। छठे समुद्देश में प्रमाणाभास का विशद विवेचन है।

आचार्य अकलङ्क के साहित्य महार्णव का मंथन कर आचार्य माणिक्यनन्दी ने 'परीक्षामुख' ग्रंथ की रचना की। ग्रंथ की सूत्रात्मक शैली माणिक्यनन्दी के गंभीर ज्ञान की परिचायिका है। इस ग्रंथ पर दिङ्नाग के न्याय प्रवेश ग्रंथ का और धर्मकीर्ति के न्याय बिंदु का प्रभाव है। गौतम का न्याय सूत्र की भांति जैन न्याय को सूत्रबद्ध करने वाला यह अलौकिक ग्रंथ है। इसकी संक्षेपक शैली निराली और नवीन है। वादिदेवसूरी की कृति प्रमाणनयतत्तवालोकालङ्कार और हेमचंद्र की प्रमाण-मीमांसा परीक्षामुख ग्रंथ से पूर्ण प्रभावित प्रतीत होती है। इस ग्रंथ पर आचार्य प्रभाचंद्र की, लघु अनंतवीर्य की, भट्टारक चारू कीर्ति की क्रमशः प्रमेयकमलमार्तण्ड, प्रमेयरत्नमाला और प्रमेयरत्नमालालङ्कार टीकाएं हैं। इन तीनों में प्रमेयकमलमार्तण्ड 12000 श्लोक परिमाण की विशाल टीका है।

*मनस्वी नयनन्दी द्वारा रचित साहित्य* के बारे में पढ़ेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...

प्रस्तुति --🌻 *संघ संवाद* 🌻
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अध्यात्म के प्रकाश के संरक्षण एवं संवर्धन में योगभूत तेरापंथ धर्मसंघ के जागरूक श्रावकों का जीवनवृत्त शासन गौरव मुनि श्री बुद्धमलजी की कृति।

🛡 *'प्रकाश के प्रहरी'* 🛡

📜 *श्रंखला -- 4* 📜

*बहादुरमलजी भण्डारी*

*जागीर प्रदान*

भंडारीजी की विभिन्न सेवाओं से जोधपुर राज्य को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त हुए थे। उससे प्रसन्न होकर नरेश तख्तसिंहजी ने उन्हें जागीर के रूप में गांव 'हरडाणी' प्रदान किया। वह उस समय तीन हजार आय का गांव था। उनके सम्मान के लिए दी गई वह जागीर उनके वंशजों के तब तक भोग में आती रही जब तक कि भारत स्वतंत्र होने के पश्चात् राजस्थान सरकार ने जागीरी प्रथा को विधिवत समाप्त नहीं कर दिया।

*स्वर्ण से बढ़कर*

एक बार नरेश ने उन्हें विशेष सम्मानित करने के लिए चारों पुत्रों— किसनमलजी, जसवंतमलजी, कानमलजी, और मानमलजी सहित पैर में स्वर्ण पहनने का अधिकार देने की इच्छा व्यक्त की। राजाओं के युग में पैर में सोने का कड़ा विशेष राजाज्ञा से ही पहना जाता था तथा उसे बड़ा सम्मान सूचक माना जाता था। भंडारीजी ने इस पर बड़ी विनम्रता से निवेदन किया कि हाथी को द्वार पर बांध लेना तो सहज है, पर उसी स्तर के अनुरूप उसका पालन-पोषण कर पाना कठिन हो जाता है। आप सम्मान दे रहे हैं यह आपकी कृपा है, पर मैं उस सम्मान के अनुरूप अन्य सभी खर्चों को आजीवन निभा सकूं तभी स्वर्ण पहनना मेरे लिए उपयुक्त हो सकता है। हम लोगों के लिए तो आपकी यह कृपा स्वर्ण से कहीं बढ़कर है। इस प्रकार उन्होंने बड़ी दूरदर्शिता पूर्वक उस सम्मान की बात को टाल दिया।

*सुनीतिमान् व्यक्ति*

एक शक्तिशाली राज्याधिकारी होते हुए भी भंडारीजी ने सुनीति तथा पवित्र व्यवहार को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया था। नीति की विशुद्धता रखने में वे कितने सावधान थे, इसका पता निम्नोक्त एक घटना से स्पष्ट लग सकता है—

उनके पड़ोस में एक सुनार का घर था जो कि प्रायः खंडहर के रूप में परिणत हो चुका था। एक बार कुचामण के ठाकुर भंडारीजी के वहां मिलने के लिए आए। उस खंडहर को देखकर कहने लगे— "इसे आप खरीद क्यों नहीं लेते?"

भंडारीजी ने कहा— "गृहपति इसे बेचना नहीं चाहता, अन्यथा मैं इसे कभी का खरीद चुका होता।"

ठाकुर साहब ने सुझाव देते हुए कहा— "आगामी वर्षा ऋतु में यदि आप अपने सेवकों को इस भींत का एक-एक पत्थर उठाने का भी आदेश दें तो यह हट जाएगी और फिर भूमि को अपने अधिकार में ले लेना कोई कठिन नहीं रह जाएगा।"

भंडारीजी ने इस बात का उत्तर देते हुए कहा— "मैं ऐसा दुर्व्यवहार किसी दूर के व्यक्ति से भी नहीं करना चाहता, यह तो पड़ोस की बात है। ऐसा करने से तो यही अच्छा है कि यह मकान मुझे न मिले।" ठाकुर साहब अपने सुझाव को अस्थानीय समझकर चुप हो गए। यह उस समय की बात है, जब कि सामंतशाही का पूरा-पूरा जोर था और सत्ताधिकारी व्यक्ति चाहे सो कर सकते थे।

*बहादुरमलजी भण्डारी पर महाराज कुमार के रोष की घटना* के बारे में पढ़ेंगे... हमारी अगली पोस्ट में क्रमशः...

प्रस्तुति --🌻 *संघ संवाद* 🌻
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👉 विजयनगर (बेंगलुरु): उपासक प्रशिक्षण व प्रवेश परीक्षा का आयोजन
👉 शांतिनगर (बेंगलुरु): मुनिवृन्द एवं साध्वीवृन्द का "आध्यात्मिक मिलन"
👉 अहमदाबाद - आध्यात्मिक मिलन
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*प्रस्तुति: 🌻संघ संवाद*🌻

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👉 प्रेक्षा ध्यान के रहस्य - आचार्य महाप्रज्ञ

प्रकाशक - प्रेक्षा फाउंडेसन

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🌻 *संघ संवाद* 🌻

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