12.02.2018 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 12.02.2018
Updated on: 14.02.2018

Update

If you carry Proud, Just because you born in Jain Family, then you need to rectify your ideology! Cause, Dharma is more than still you reached. -आप जिस धर्मं/जाति में पैदा हुए इसलिए Proud करते है तो जरा एक बार और सोच ले.. Must Read #share

महावीर स्वामी के समय में जैन शब्द नहीं था, जो जिन के अनुयायी होते थे बस, तब लोग जानते और मानते थे की जिन को मानने वाला सम्यक-मार्गी है क्यों??? क्योकि देव का सम्यक स्वरुप, धर्मं का सम्यक स्वरुप बिना किसी भेदभाव और निष्पक्ष रूप से जहा बताया गया तथा अहिंसा का Live जिन में और जिन का लघुनंदन मतलब निर्ग्रन्थ मुनिराज में मिलता था, महावीर कौन थे, प्रकृति के सम्यक रूप मतलब नग्न रहे और अहिंसा ही परम धर्मं है ऐसा अपनी लाइफ में जिए और जो कर्म उनकी आत्मा से लगे थे उनको हटा दिया और केवलज्ञान प्राप्त किया और जो उन्होंने केवलज्ञान से जाना वही सबको बताया, उनके पास ना तो झूट बोलने का कारन था, न राग था, ना द्वेष था, तो लालच के कारन उपदेश देने का कोई कारन ही नहीं बचता, उनको ना भूख, ना पसीना, ना मृत्यु का दर, न आश्चर्य, ना डर था, उनको कोई हतियार रखने की जरुरत नहीं थी क्योकि उनके पास जब कर्म ही नहीं रहे तो कोई कैसे कुछ बिगाड़ सकेगा, इस बात को जैन धर्मं के मानने वाले क्या विश्व की कोई भी धर्मं/पंथ अस्वीकार नहीं कर सकता की यदि अशुभ कर्म का उदय ना हो तो कोई कुछ नहीं कर सकता जबकि यहाँ तो कर्म ही नहीं बचे |

विश्व के बड़े बड़े विद्वान् और अन्य प्रचलित धर्मं के मानने वाले व्यक्तियों ने अहिंसा का उपदेश तो दिया लेकिन जहा अहिंसा सत्य रूप से साक्षात पाई गयी वो निर्ग्रन्थ साधू होते थे, जो जैन साधू नहीं थे, प्रकृति के वास्तविक रूप और स्वरुप वाले होते थे, अन्दर से वासना से रहित और बाहर से भी वासना से रहित | आज भी बहुत से ऐसे सज्जन पुरुष है जो हिन्दू हो या कोई और मान्यता वाले लेकिन स्वीकार करते है की दिगंबर साधू की चर्या और महानता का कोई मूल्याङ्कन नहीं किया जा सकता है, और सही मायने में जैसा मैंने समझा तो पाया की धर्मं तो जैन या हिन्दू या मुस्लिम या सिख...कोई भी हो इन सबसे उपर है....बस उस धर्मं के मानने वालो को वर्तमान में जैन कहा जाता है, इसमें दोष हम जैन लोगो का भी है की हम धर्म के वास्तविक स्वरुप को नहीं समझते और जैन धर्मं को भी पंथ और जाति विशेष मानते है |

अगर हमने जैन धर्मं से सम्बंधित फॅमिली में जन्म लिया तो ये proud होने वाली इतनी बात नहीं बल्कि धर्मं को समझने वाली बात है, धर्मं को समझने का अवसर है, लेकिन हम बाहर से ही बस जैन धर्मं में पैदा होना proud नहीं, बल्कि जिन द्वारा प्रतिपादित धर्मं से अपने ह्रदय को सम्यक-दर्शन से पवित्र बना लेना है...जैसा मैंने जिनवाणी से पढ़ा और समझा तो जाना की सही में अगर धर्मं का वास्तविक स्वरुप समझमे आजाये तो जैन, हिन्दू, मुस्लिम, सिख आदि में लड़ाई तभी ख़तम हो जाए, जिनने जैन धर्मं में जन्म लिया तो धर्मं उसकी संपत्ति नहीं होगई और सिर्फ जैन धर्मं में जन्म लेने से कोई धर्म का स्वरुप समझने वाला नहीं हो सकता लेकिन हा...अगर किसी का जैन धर्मं वाली फॅमिली में जन्म होता है तो उसका कुछ पुण्य तो होता है क्योकि जैन धर्मं की फॅमिली में जन्म होने से वो व्यक्ति अपने आप बहुत सारे पापो से बच जाता है, जैसे शाकाहारी रहता है, स्थूल हिंसा से बचता है, जिमीकंद आदि कम खाता है, फॅमिली में धर्मं हो तो रात्री भोजान आदि भी नहीं खाता, व्यभिचार या काम वासना आदि से सम्बंधित काम नहीं करता, मैंने एक बार बड़ा सोचा की जैन धर्मं मध्य प्रदेश की तरफ है और साथ में एक बात और भी है की अगर बड़े शहरो से तुलना करो तो मध्य प्रदेश में रहन-सहन काफी simple है, और लोग भी काफी भोले -भाले और धर्मं की भावना सहित है, तो ऐसे देखने में आज की हम Generation को लग सकता है की दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि की लाइफ क्या लाइफ है...एकदम बिंदास |

लेकिन अगर सोचो तो यहाँ की जिंदगी जिंदगी नहीं है, सही में तो मध्य-प्रदेश की और जाओ तो यहाँ व्यक्ति बड़ा शांत और उनके जीवन में ज्यादा भाग-दोड नहीं है तो उसका कर्म बंधन भी कम है, कषाय कम है, धन कमाने की होड़ भी कम है, धर्मं करने का समय भी है, और काम वासना और विषय कषाय और attract करने वाली वस्तु भी कम है, खान पा पवित्र है और मर्यादा से सहित है, धर्मं की जीवंत स्वरुप आपको वह मिल सकता है, ये बहुत बड़ा कारण है की साधू वही पर रहे है....बड़े बड़े धर्मं शास्त्र उठाकर देखो तो समझ में आजाता है, एक आचार्य भक्ति की आदर्श स्वरुप को दिखाने के लिए मेंढक का उदाहरण लेते है क्या वो जैन था??? दूसरी और दुसरे आचार्य चंडाल का उदहारण लेते है जिसकी देवो में रक्षा की और उस पर फुल वर्षा और उसका यथायोग्य आदर किया वो चंडाल क्या जैन था??? अरे रोज लोगो को सूली पर लटकाता था और फिर भी उसका नाम सब से पहले लिया और जन्म से जिन का उपासक ना होते हुए भी सिर्फ नाम के जैन लोगो के उपर था, क्या जैन फॅमिली में जैन पैदा होने से आप जिन धर्मं के मानने वाले हो गए? अगर बिना चर्या और आचरण के काम होना होता तो कब का हो गया होता, लेकिन भैया जब तब जीवन में सम्यक-दर्शन, ज्ञान को चारित्र को समझना होगा क्या होता है,...हजारो उदाहरण है, अगर हम सही से जिनवाणी का अध्यन करे तो आंखे खुल जाए.....और धर्मं की विषय इतना गंभीर और व्यापक है की उसको समझा तो जा सकता है लेकिन दुसरो को समझाना बहुत मुश्किल है क्योकि हम लोगो की बुद्धि में जिस color का चश्मा लगा होता है चीज़ वैसे ही दिखती है....अगर धर्मं/पंथ के नाम पर लड़े तो बस फिर हम पंथ के नेता तो बन सकेंगे लेकिन धर्मं के real स्वरुप को लाइफ में आनंद नहीं कर सकते या उसको समझ नहीं सकते |

जिनेन्द्र वर्णी जी ने आंखे खोल देने वाली बात कही और पढने वाले को हिला कर रख दिया है ऐसे धर्मं का स्वरुप और वर्णन किया की कोई पढ़े तो फिर वो कितना भी अपने को ज्ञानवान या बुद्धि वाला समझता हो उसकी अक्कल ठिकाने आजाये, वे कहते है व्यक्ति जीवन में अच्छी जॉब के लिए प्रथम क्लास से UP, PG और master पता नी क्या क्या करता है और कितने कितने वर्ष जीवन के लगाता है जो उसको उस जीवन में आगे अच्छा career देगा लेकिन जो आगे हजारो जीवन में आपको अच्छा जीवन और दुःख, द्वेष आदि से हटा सकता है आपको Ultimate शांति दे सकता है, जीवन मृत्यु के चक्कर से हटा कर मोक्ष दे सकता है ऐसे धर्मं का स्वरुप आप सिर्फ 10 मिनट में समझना चाहते है और short में समझना चाहते है जो की सम्भव नहीं और सबसे बड़ा आश्चर्य है |

Written As per my understanding of dharma and all things - Nipun Jain

News in Hindi

महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के महामस्तकाभिषेक समारोह के उदघाटन के अवसर पर दिया गया पूरा संदेश पढ़ें-

श्रवणबेलगोला।देश के राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद ने 7 फरवरी 2018 को कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के महामस्तकाभिषेक के भव्य और ऐतिहासिक महा महोत्सव का उदघाटन अपने कर कमलों से किया । इस अवसर पर महामस्तकाभिषेक का कुशल नेतृत्व कर रहे जगतगुरू पूज्य स्वस्ति श्री चारुकीर्ति जी स्वामी,राष्ट्रपति महोदय की धर्मपत्नी श्रीमती सविता कोविंद जी भी उपस्थित रहीं। साथ में कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वालाजी, मुख्यमंत्री सिद्धरमैया जी, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री एच डी देवगौड़ा जी,राजर्षि श्री वीरेंद्र हेगड़े जी, कर्नाटक के पशुपालन मंत्री ए.मंजू जी, अभय चंद जी, महामस्तकाभिषेक समारोह की अध्यक्षा श्रीमती सरिता जैन चेन्नई आदि लोग उपस्थित रहे ।

इस अवसर पर देश के महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी ने अपने संबोधन में कहा कि शांति, अहिंसा, करुणा की प्रतीक बाहुबली की प्रतिमा को देखकर मुझे अति प्रसन्नता हो रही है। यह क्षेत्र सदियों से मानवता का संदेश देता रहा है ।हम सभी जानते हैं कि ऋषभदेव (आदिनाथ) के पुत्र भगवान बाहुबली चाहते तो अपने भाई भरत के स्थान पर राजसुख भोग सकते थे। लेकिन उन्होने सब कुछ त्याग कर तपस्या का मार्ग अपनाया और पूरी मानवता के कल्याण के लिए आदर्श प्रस्तुत किये। 1,000 वर्ष पहले बनाई गई यह प्रतिमा उनकी महानता का प्रतीक है।

इस प्रतिमा के कारण यह क्षेत्र देश- विदेश में आकर्षण का बड़ा केंद्र रहा है। हमारी सांस्कृतिक और भौगोलिक एकता का बहुत बड़ा केंद्र यह क्षेत्र बना हुआ है ।आज से 23 सौ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के उज्जैन से जैन आचार्य भद्रबाहु यहां पधारे थे। बिहार के पटना क्षेत्र के उनके शिष्य मौर्य साम्राज्य के संस्थापक मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त भी यहां आए थे ।वह अपनी शक्ति के शिखर पर रहते हुए भी सारा राजपाट छोड़कर अपने पुत्र बिंदुसार को राज सौपकर यहां आ गए थे। यहां आकर उन्होंने एक मुनि का जीवन अपनाया और तपस्या की। यहीं चंद्रगिरी की एक गुफा में अपने गुरु का अनुसरण करते हुए चंद्रगुप्त ने सल्लेखना का मार्ग अपनाया और शरीर का त्याग किया। राष्ट्र निर्माताओं ने शांति, अहिंसा,करुणा और त्याग पर आधारित परंपरा की यहां नीव डाली। धीरे-धीरे देश के लोग यहां आने लगे और यह क्षेत्र आकर्षण का केंद्र बन गया। जैन परंपरा की धाराएं पूरे देश को जोड़ती हैं,मैं जब बिहार का राज्यपाल था तब भगवान महावीर की जन्म और निर्वाण भूमि में जाने का अवसर मिला था। आज यहाँ आने का अवसर प्राप्त हुआ है।

लगभग 1000 वर्ष पहले इस विशाल और भव्य प्रतिमा का निर्माण कराया गया था। इस प्रतिमा का निर्माण कराने वाले गंगवंश के प्रधानमंत्री चामुंडराय और उनके गुरु ने सन 981 में पहला अभिषेक किया था उसके बाद हर 12 वर्ष में अभिषेक की परंपरा चालू हुई, जो आज भी जारी है। भगवान बाहुबली की यह विशाल प्रतिमा जो हम सब लोगों के लिए दर्शनीय है।

गोमटेश्वर की यह प्रतिमा भारत की विकसित संस्कृति,स्थापत्य कला, वास्तुकला और मूर्ति कला का बेजोड़ उदाहरण है ।शिल्पकारों ने अपनी श्रद्धा और भक्ति से एक विशाल निर्जीव ग्रेनाइट के पत्थर में जान डाल दी । अहिंसा परमो धर्म का भाव इस प्रतिमा के मुख मंडल पर अपने पूर्ण रूप में दिखाई देता है। भगवान बाहुबली की यह दिगंबर प्रतिमा और इसपर माधवी लताओं की आकृतियां उनकी तपस्या के बारे में बताने के साथ-साथ यह भी स्पष्ट करती है कि वह किसी भी बनाबटी से मुक्त थे और प्रकृति के साथ एकाकार थे ।जैन मुनियों ने यह परंपरा आज भी कायम रखी है ।जैन धर्म के आदर्शों में हमें प्रकृति के संरक्षण की सीख मिलती है। जैन धर्म में सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र को तीन रत्नों के रूप में जाना जाता है लेकिन यह तीनों पूरे विश्व के लिए कल्याणकारी हैं।शांति,अहिंसा,भाईचारा, नैतिक चरित्र द्वारा ही विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

मुझे बताया गया है कि विश्व शांति हेतु प्रार्थना करने के लिए कई बाहरी देशों से तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों से भारी संख्या में आज यहां श्रद्धालु आए हुए हैं। हमारे सामने जो विद्यमान गोम्टेश की प्रतिमा है उसके चेहरे पर भी पीड़ित मानवता के कल्याण के लिए सहानुभूति का भाव दिखाई देता है ।आप सब की प्रार्थना में निहित विश्व कल्याण की भावना आतंकवाद और तनाव से भरे इस दौर में सभी के लिए शिक्षाप्रद है। मैं सभी देशवासियों की ओर से विश्व शांति के लिए प्रतिबद्ध आप सभी श्रद्धालुओं को इस कल्याणकारी प्रयास में सफलता की शुभकामना देता हूं ।मुझे प्रसन्नता है कि आप सभी श्रद्धालुओं के साथ जैन धर्म के इस ऐतिहासिक महाकुंभ महोत्सव का मुझे साक्षी बनने का आज अवसर मिला है ।मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यहां के ट्रस्ट के प्रयास से बच्चों के लिए स्कूल,अस्पताल, इंजीनियरिंग कॉलेज, पॉलिटेक्निक और नर्सिंग कॉलेज की स्थापना कराई गई है और एक प्राकृत विश्वविद्यालय के निर्माण पर भी कार्य चल रहा है। मैं सभी आयोजकों,श्रद्धालुओं, पंचकल्याणक,महामस्तकाभिषेक से जुड़े सभी आयोजनों के सफलता की कामना करता हूं।
इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल महामहिम वजूभाई वाला ने कहा कि हम सभी आज यहां पर आध्यात्मिक और पवित्र कार्य के लिए एकत्र हुए हैं । हम यहां पाषाण की मूर्ति के दर्शन के लिए एकत्र नहीं हुए हैं बल्कि मूर्ति में जो सत्य, अहिंसा रूपी चेतनता है, हम सब उसके दर्शन के लिए एकत्रित हुए हैं । हमारी संस्कृति त्याग की संस्कृति है ।महावीर ने राजपाट का त्याग किया ।गोमटेश्वर बाहुबली भगवान त्याग से महान बने। हमारी संस्कृति देने की संस्कृति रही है। देने में आनंद आता है। देश की सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने के लिए हमें भौतिकवाद को छोड़कर अध्यात्म की ओर जाना होगा। राज्यपाल महोदय ने भामाशाह के महान दान का भी उल्लेख करते हुए समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए कुछ ना कुछ त्याग करने की बात कही ।उन्होंने जैन दर्शन के सत्य, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य को जीवन में उतारने की बात पर जोर दिया ।कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया जी ने भी गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के इस महामस्तकाभिषेक को ऐतिहासिक बताया। राजर्षि डॉक्टर वीरेंद्र हेगड़े जी ने भी इस अवसर पर सभा को संबोधित किया। जगतगुरु पूज्य स्वस्ति श्री चारुकीर्ति जी स्वामी ने भी अपने उद्बोधन में भगवान बाहुबली के महामस्तकाभिषेक की ऐतिहासिक परंपरा के बारे में अवगत कराया और महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी के अपनी धर्मपत्नी सविता गोविंद जी के साथ पधारने पर उनका अभिनंदन किया

श्रवणबेलगोला स्थित गोम्मटेश्वर भगवान बाहुबली के महामस्तकाभिषेक में शामिल होना सभी का कर्तव्य- #आचार्य_विद्यासागर जी महाराज #SharePls

गोम्मटेश्वर भगवान बाहुबली महामस्तिकाभिषेक की प्रभावना रथ यात्रा अतिशय क्षेत्र चंद्रगिरि ड़ोंगरगढ़ में संत शिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज के आशीर्वाद हेतु पहुँची।

परम पूज्य आचार्य श्री ने ससंघ पहुँच कर रथ में विराजमान सभी प्रतिष्ठित प्रतिमाओं के दर्शन किये एवं रथयात्रा के राष्ट्रीय संयोजक पं. श्री सुरेश जैन “मारौरा” इंदौर एवं उनकी पूरी टीम तथा समस्त समिति को अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया ।

दोपहर में आयोजित धर्मसभा में पू, आचार्य श्री ने कहा कि गोम्मटेश्वर भगवान बाहुबली की प्रतिमा 1000 वर्षों से त्याग और एकता का संदेश समस्त विश्व को दे रही है। दूरी काफी होने की वजह से महमस्तकाभिषेक में शामिल होना हमारे लिए संभव नही है। आचार्य श्री ने आगे कहा कि दिगम्बर जैन धर्म की एकता के प्रतीक भगवान बाहुबली के महामस्तकाभिषेक में सभी श्रावकों को अपना कर्तव्य समझ कर शामिल होना चाहिए और सभी को अभिषेक करना चाहिए।

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