05.10.2017 ►Media Center Ahinsa Yatra ►News

Posted: 05.10.2017

News in Hindi:

अहिंसा यात्रा प्रेस विज्ञप्ति

  • मनुष्य गति प्राप्त करने के चार कारणों का महातपस्वी आचार्यश्री ने किया वर्णन
  • ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यान शृंखला के अंतर्गत आचार्य भारमलजी के शासनकाल को किया व्याख्यायित
  • आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में ‘जीवन-विज्ञान सेमिनार’ का हुआ शुभारम्भ 
  • आचार्यश्री ने प्रदान किया आशीर्वाद, सेमिनार से जुड़े लोगों ने भी दी भावाभिव्यक्ति
  • शिक्षा, संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव श्री अतुल कोठारी ने भी किए आचार्यश्री के दर्शन


05.10.2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)ः

जीव चार कारणों से मनुष्य गति का बंध करता है। जो जीव प्रकृति से भला, हो विनीत हो, जिसका हृदय में दया और अनुकंपा हो और दूसरों के गुणों को देखकर ईष्र्या न आए बल्कि प्रमोद भाव हो तो जीव मनुष्य गति का बंध कर सकता है। उक्त आगमाधारित ज्ञान की बातें गुरुवार को अध्यात्म समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें देदीप्यमान आचार्य, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, शांतिदूत, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बताईं।

    आचार्यश्री ने अपने मंगल प्रवचन का प्रारम्भ मुनि मेघकुमार की कथा से आरम्भ करते हुए कहा कि एक बार राजा श्रेणिक उदास बैठा रहता है तो राजा का पुत्र अभयकुमार उनके पास आता है और उनके उदास चेहरे को देख उनसे उदासी का कारण पूछता है। राजा श्रेणिक अपने पुत्र को अपनी उदासी का कारण बताता है। अभयकुमार तीन दिन की तपस्या कर एक देव को प्रसन्न करता है और बनसे बरसात कराने का अनुरोध करता है। बरसात होती है, राजा श्रेणिक अपनी पत्नी के साथ हाथी पर चढ़कर क्रीड़ा को जाते हैं। उसके उपरान्त एक बालक का जन्म होता है और उसका नाम मेघकुमार रखा जाता है। बड़े होने के साथ ही मेघकुमार के अंदर दीक्षा के भाव जागृत होते हैं, किन्तु माता के कथनानुसार पहले वे राजा बनते हैं और तत्काल बाद भगवान महावीर के पास दीक्षा स्वीकार कर लेते हैं। रात में सोने के समय हुई असुविधा से क्षुब्ध होकर वे भगवान महावीर के पास साधुपने का त्याग करने पहुंचते हैं और भगवान महावीर द्वारा उनके हाथी वाले भव की याद दिलाकर उनके सहिष्णुता, दया के भाव को जागृत करते हैं और मुनि मेघकुमार पूर्ण रूप से समर्पित हो जाते हैं। इस प्रकार आचार्यश्री ने लोगों को मनुष्य गति प्राप्त करने के चार कारणों से अवगत कराया।

    आचार्यश्री ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यान शृंखला के अंतर्गत लोगों आचार्यश्री भारमलजी के शासनकाल का वर्णन किया। आचार्यश्री ने उनके कड़े अनुशासन आदि का भी सविस्तार वर्णन सरसशैली में किया।

    आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में आरम्भ हुए जीवन-विज्ञान की सेमिनार के संदर्भ में आचार्यश्री ने पावन आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि जीवन-विज्ञान ऐसा उपक्रम है जो विद्यार्थियों का भावात्मक और मानसिक विकास करने वाला है। यह सेमिनार कुछ नया और विशेष प्रदान करने वाला बने, यह काम्य है।

    आचार्यश्री के मंगल आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरान्त जीवन-विज्ञान अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री गौतमचंद सेठिया, जीवन-विज्ञान के राष्ट्रीय संयोजक श्री राजेश खटेड़ ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

    वहीं इस सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे शिक्षा, संस्कृति उत्थान न्यास नई दिल्ली के सचिव श्री अतुल कोठारी ने आचार्यश्री के दर्शन कर पावन आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरान्त अपनी भावनाओं को श्रद्धासिक्त भावाभिव्यक्ति दी।

English [Google Translate]

Non-violence travel press release
For four reasons, the creature makes the bond of motion: Acharyashree Mahasaman

  • The four reasons for achieving human speed
  • Tarapanth Prabodh under the lecture series explained the reign of Acharya Bharhamlaji
  • The inauguration of 'Life Sciences Seminar' in Aankaryashree's Mars Sannidhi
  • Acharyashree has given blessings, people associated with seminars also gave the Bhavbhyavyakti
  • Shri Atul Kothari, Secretary of Education Upliftment Trust also visited Acharyashree's philosophy


05.10.2017 Rajarhat, Kolkata (West Bengal):

Organism For four reasons man stays in motion. Whatever creature is good with nature, be unobtrusive, whose heart is compassionate and compassionate, and does not get enlightened by looking at the qualities of others, but in the form of pramod, the organism can bond with motion. On Thursday, the words of the above-mentioned knowledge were presented to the devotees present in Spiritual Sociology, the eleventh glorified Acharya of Jain Shvetambar Terapanth Dharmasangha, pradhan of Ahimsa Yatra, peace be upon him, and Maharatapi Acharyasri Mahasramanji.

Acharyashri started the beginning of his Mangal discourse from the story of Muni Maghakumar and said that once the king's class is sad, then the king's son Abhyakumar comes to them and looking at his sad face asks him the reason of sadness. King Kartik tells his son the reason for his sadness. Aapakumar pleases a god by performing penance for three days and requests for rain. It is rainy, Raja Karte goes with his wife on an elephant and goes to the sport. After that a child is born and his name is Meghkumar. As soon as grown up, the awakening of the initiation inside Meghkumar is awakened, but according to the mother's statement, first they become kings and immediately after accepting initiation with Lord Mahavira. Troubled by the inconvenience caused by sleeping at night, they arrive to Lord Mahavir to relinquish Sadhoo, and by reminding Lord Mahavir of his elephant Bhava, awakens his tolerance, sense of compassion, and Muni Meghkumar is fully devoted Go. Thus, Acharyashree made people aware of four reasons for achieving human speed.

Acharyashree described the reign of Acharyashree Bharamblaji under the 'Terapanth Prabodh' narrative series. Acharyashree also detailed his strict discipline in Sarasashali.

In the context of the seminar of life science initiated in Acharyashree's Mangal Sananidha, Acharyashree gave holy blessings and said that life science is such an initiative that is to develop the emotional and mental development of the students. This seminar has become something new and special, it is good work.

Upon receiving the blessings of Acharyashri's blessings, Shri Gautam Chand Sethia, National President of Life Sciences Academy, National Convenor of Life Sciences, Mr. Rajesh Khate gave his brother-in-law in front of Acharyashree.

At the same time, as a Chief Guest in the seminar, Education, Culture Upanishad Trust, New Delhi Secretary, Mr. Atul Kothari visited the Acharyashree and after receiving his blessings, after receiving the blessings, he gave his devotion to the devotees.
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