29.09.2017 ►Media Center Ahinsa Yatra ►News

Posted: 29.09.2017
Updated on: 15.11.2017

News in Hindi:

अहिंसा यात्रा प्रेस विज्ञप्ति
ऐसा हो प्रयास कि शुभ कर्मों का अनुबंध भी हो शुभ: आचार्यश्री महाश्रमण

  • -आचार्यश्री ने आगम में वर्णित कर्म और उसके अनुबंधों को किया विश्लेषित
  • -अणुव्रत के व्रतों का पालन, संयम द्वारा पर्यावरण को प्रदूषण से बचने की दी प्रेरमा
  • -विशेष मंत्र जप का आज से हुआ परिसम्पन्न, जारी है ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यान शृंखला
  • -हजारों श्रद्धालुओं ने विशेष मंत्र जप का नवरात्र में उठाया लाभ


29.09.2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)ः

कोलकाता के राजरहाट स्थित महाश्रमण विहार परिसर में बने अध्यात्म समवसरण से बहने वाली आध्यात्मिकता की ज्ञानगंगा ने जन-जन के मन का अभिसिंचन कर रही है। हर रोज नई ज्ञान की बातों से लोग लाभान्वित होते हैं। अपनी आत्मा के कल्याण का सहज, सरस और सरल भाषा में दिशा प्राप्त करते हैं और तमाम बुराइयों से बचने के तरीकों की जानकारी भी प्राप्त करते हैं और यह सब सहज प्राप्त हो रहा है उन श्रद्धालुओं को जो जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में पहुंचते हैं। मानों में वे अपने जीवन को मंगल बनाने के लिए ही महातपस्वी की मंगल सन्निधि में उपस्थित होते हैं। शुक्रवार को उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी अमृतमयी वाणी का रसपान कराया और उन्हें अपने शुभ कर्मों पर भी विशेष ध्यान देने की प्रेरणा प्रदान की और कहा कि आदमी को ऐसा शुभ कर्म करना चाहिए, जिसका अनुबंध भी शुभ हो। साथ ही आचार्यश्री ने नवरात्र के अंतिम दिन अर्थात् महानवमी को भी विशेष मंत्रों का जप कराया। आचार्यश्री ने तेरापंथ आख्यान शृंखला को भी अनवरत जारी रखा।

    शुक्रवार को अध्यात्म समवसरण मंे उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी मंगलवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि आदमी को सुख-दुःख उसके कर्मों के आधार पर प्राप्त होता है। कर्म अच्छा हो तो फल शुभ और कर्म बुरा हो तो अशुभ फल अर्थात् दुःख प्रदान करने वाले होते हैं, किन्तु आचार्यश्री ने आगम में वर्णित कर्मवाद के सिद्धांत के आधार पर गूढ़ रहस्य को बताते हुए कहा कि आदमी के कर्म शुभ होने के साथ ही यह भी प्रयास होना चाहिए कि शुभ कर्मों से होने वाला अनुबंध भी शुभ तो सुखकारी हो सकता है अन्यथा शुभ कर्मों का बंध यदि अशुभ को तो वह भी दुःख का कारण बन सकता है। इसलिए आदमी को इस ओर विशेष रूप से ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कुछ कर्म शुभ और उनका अनुबंध भी शुभ होता है। कुछ कर्म शुभ पर उनका अनुबंध अशुभ होता है। कुछ कर्म अशुभ पर उनका अनुबंध शुभ होता है और कुछ कर्म अशुभ और उनका अनुबंध भी अशुभ होता है। कुछ कर्म पुण्यानुबंधी होते हैं। जिनके द्वारा पाप का अनुबंध नहीं होता। कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो पुण्य के बंध से उदय में आ रहे हैं, किन्तु उनके द्वारा आगे के लिए पाप का बंध हो जाए, वे पापानुबंधी पुण्य होते हैं। कुछ ऐसे तो अभी तो अशुभ हैं और आगे शुभ हो सकते हैं वे पुण्यानुबंधी पाप होते हैं। अंतिम बंध जो पाप से उदय में आते हैं और आगे भी पाप का बंध कराने वाले हो सकते हैं, वे पापानुबंधी पाप।

    आचार्यश्री ने गृहस्थ जीवन के सात सुख निरोगी काया, घर में माया (धन-संपदा) सुलक्षणा नारी, आज्ञाकारी पुत्र, अच्छा पड़ोसी, घर में गाय और राजा से निकटता। इस प्रकार यह सारी चीजें आदमी को अनुकूलत हों तो वह गृहस्थ सबसे सुखी होता है। आदमी को सुखों की प्राप्ति पुण्य कर्मों के बंध से ही प्राप्त होते हैं। इसलिए आदमी को अपने कर्मों पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए और अच्छा कर्म करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने अणुव्रत को स्वीकार करने, प्राकृति वस्तुओं के प्रयोग में संयम बरतने यथा पानी के अपव्यय, पेड़ों को काटने, बिजली के अत्यधिक प्रयोग आदि से बचने की पावन प्रेरणा भी प्रदान की। अंत मंे आचार्यश्री ने ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यान शृंखला द्वारा लोगों को तेरापंथ धर्मसंघ के दूसरे आचार्य के कार्यकाल के कार्यों का सरसशैली में वर्णन किया।

English [Google Translate]

Non-violence travel press release
Such auspicious efforts should also be auspicious: Acharyashree Mahasamani

  • Acharyashree performed the work described in Agam and its contracts analyzed
  • Anvrutta's adherents, patience granted to save environment from pollution
  • Special mantra chant today is a matter of dedication, continuing 'Terapanth Prabodh' narrative series
  • Hundreds of pilgrims took advantage of special mantra chanting in Navratri


29.09.2017 Rajarhat, Kolkata (West Bengal):

Dnyanganga of Spirituality which is flowing through the spirituality of Shivaji in Mahasamana Vihar premises situated in Rajarhat, Kolkata, is converting the mind of the people. Every day people benefit from new knowledge. Receive the direction of the well-being of the well-being and the simple language of the well-being of your soul, and also acquires knowledge of ways to avoid all evils, and it is getting all easily available to those devotees, who are the Ekadashmadhyasa of Jain Shvetambar Terapanth Dharma Sangh, Lord Mahavir Representatives of Achishashree Mahishmanji, the pioneer of non-violence, arrive in Mangal Sanindh. In the values, they are present only in the mahantapi's mangal sannidhi to make their life mangal. On Friday, Acharyashree gave a lecture of her elixir and gave her inspiration to pay special attention to her good deeds and said that man should do such auspicious work, whose contract is also auspicious. Also, Acharyashri chanted special mantras on the last day of Navratri ie, Mahanavami. Acharyashree continued to persevere to the Teerthth narrative series.

On Friday, the devotees presenting the devotees present in Spiritual Sociology, Acharyashree said, while taking a taste of Manglani, the man gets pleasure and pain on the basis of his actions. If the karma is good then the fruit is good and the evil is bad, it is the inauspicious result that is miserable, but the acharyashree told the enigmatic mystery on the basis of the principle of action of the action described in the Agam, that with the auspiciousness of man's actions, this too Effort should be made that the contract from auspicious karmas can be auspicious and auspicious otherwise otherwise the good deeds can be bonded if it is inauspicious that it can also cause sorrow. Therefore man should strive to pay particular attention to this. Like some auspicious auspicious and his contract is also auspicious. His contract is unlucky on some karmic auspicious. His actions are auspicious on some inauspicious and some actions are inauspicious and their contracts are also inauspicious. Some karmas are related to pune. By whom sin is not contracted There are some karma that are coming from the bondage of virtue, but by which they become the bond of sin for the next, they are papalistic virtues. Some of them are still inauspicious and may be auspicious for the next time, they are sinful. The last bond which can come from sin, and who can become even more sinful of sin, they are polytheistic sins.

Acharyashree has seven healthy pleasures of domestic life, Maya in the house (wealth wealth), woman in love, obedient son, good neighbor, close proximity to cow and king in the house Thus, all these things are suitable to man, then the householder is most happy. The human being receives the pleasures of pleasures only by the bondage of virtuous deeds. That is why a person should try to pay attention to his deeds and try to do good deeds. Acharyashree also gave the holy inspiration of accepting the atomic energy, abstinence in the use of nature objects such as wastage of water, cutting of trees, excessive use of electricity etc. In the end, Acharyashri described the people in the form of 'Terapanth Prabodh' narrative series in the style of the work of the second Acharya of the Thrapanth Dharma Sangh.

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