25.09.2017 ►Media Center Ahinsa Yatra ►News

Posted: 25.09.2017
Updated on: 15.11.2017

News in Hindi:

अहिंसा यात्रा प्रेस विज्ञप्ति
बीमारी में भी समता के प्रयोग से हो सकती है कर्मों की निर्जरा

  • -आचार्यश्री महाश्रमण ने श्रद्धालुओं को ब्याधि में मनोबल रखने की पावन प्रेरणा
  • -स्वावलम्बी बनकर अपने काम के साथ दूसरों का भी भला का हो प्रयास
  • -‘तेरापंथ प्रबोध’ में वर्णित तेरापंथ की बढ़ती प्रभावना का किया वर्णन
  • -बहती ज्ञानगंगा में श्रद्धालुओं ने लगाए गोते


25.09.2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)ः
पश्चिम बंगाल राज्य में वर्तमान में नवरात्रि की विशेष धूम है। पूरा भारत ही नहीं पूरा विश्व में बंगाल होन वाली दुर्गापूजा सुप्रसिद्ध है। चारों ओर भव्य, विशाल पूजा पंडाल में कोलकाता के कारिगरों की अद्भुत कला का नमूना देखने को मिलता है। ऐसे माहौल में भी पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से उठ रही, सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की जन कल्याणकारी आवाज पूरे दुनिया में सुनाई दे रही है और इससे जनमानस भी अपने जीवन को सुलभ, सुन्दर, सुखद और शांत बनाने का प्रयास कर रहा है। इन सबके पीछे एक राष्ट्रसंत, महायोगी, महातपस्वी, अखंड परिव्राजक और भगवान महावीर के प्रतिनिधि के रूप में सुप्रसिद्ध जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मानव कल्याण की भावना है। वर्तमान में कोलकता के राजरहाट में स्थित महाश्रमण विहार में वर्ष 2017 का चतुर्मास सम्पन्न कर रहे हैं। आचार्यश्री का यह चतुर्मास कोलकाता ही नहीं, पूरे पश्चिम बंगाल में शांति और सौहार्द की पावन प्रेरणा प्रदान कर रहा है। साथ ही इसकी गूंज पूरे देश भर ही नहीं विदेशी धरती पर सुनाई दे रही है। जिससे आकर्षित होकर मानव समाज ऐसे महातपस्वी की सन्निधि में प्रतिदिन पहुंचते हैं और उनकी मंगलवाणी का श्रवण कर अपने जीवन को शांतिमय, सौहार्दपूर्ण और सुखी बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

    सोमवार को ऐसे महासंत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘अध्यात्म समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को ठाणं आगम के आधार पर श्रद्धालुओं को बीमारी जैसे विकट समय में भी समता और शांति रखने की पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा शरीर को ब्याधियों का मंदिर बताया गया है। इसलिए आदमी को स्वस्थ रहते हुए जितना हो सके, धर्म, ध्यान और अच्छे कार्य करने का प्रयास करना चाहिए।

    आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि यदि आदमी के शरीर में कोई बीमारी हो जाए तो उसे समता से सहन करने का प्रयास करना चाहिए और मनोबल भी रखने का प्रयास करना चाहिए। बीमार होने के बावजूद भी आदमी को मनोबल रखते हुए जितना संभव हो उसे अपना काम स्वयं करने का प्रयास करना चाहिए। खुद को ज्यादा बीमार-बीमार की भावना न रखते हुए जितना संभव हो कार्य करते रहने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए जितना संभव को समता भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। बीमारी से उचित रूप में मैत्री करने की भावना का भावना का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी बीमारी में मनोबल रखे, समता भाव से सहन करे, वह खास बात होती है। बीमारी को समता से सहन करने से आदमी के कर्मों की निर्जरा भी हो सकती है।

    आचार्यश्री ने लोगो को स्वावलंबी बनने की पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि परवशता के अनुसार दुःख नहीं और स्वावलंबन के समान कोई सुख नहीं होता है। इसलिए आदमी को बीमारी की अवस्था में भी ज्यादा दूसरों के भरोसे नहीं रहने का प्रयास करना चाहिए और अपना काम स्वयं पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए। बीमारी की भौतिक चिकित्सा भी यथासंभव हो, किन्तु बीमारी में आध्यात्मिक चिकित्सा का प्रयोग भी करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए कायोत्सर्ग, मंत्र जप, ध्यान, स्वाध्याय आदि के माध्यम से मन को शांत और स्थिर बनाने का प्रयास हो और आदमी बीमारी को समता से सहे तो कर्म की निर्जरा हो सकती है और आत्मा निर्मल बन सकती है। इसलिए आदमी को बीमारी में भी समता और शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यान शृंखला में महामना आचार्य भिक्षु के महाप्रयाण के उपरान्त तेरापंथ धर्मसंघ से जुड़े साधु-साध्वी और श्रावक समाज की प्रभावक संख्या का भी वर्णन किया।

English [Google Translate]

Non-violence travel press release
In the disease also, the use of equality can be done by the deeds of deeds

  • -Acharyashree Mahasaman, the holy inspiration of keeping devotees in morale
  • - Becoming self-reliant with the work of others as well.
  • Description of the growing influence of the Tropanth described in 'Prataptha'
  • - Divers installed by devotees in most of Gyan Ganga


25.09.2017 Rajarhat, Kolkata (West Bengal):
In the state of West Bengal, Navratri currently has a special splash. Durgapuja, which is Bengal, is not well known throughout the whole of India. Around the grand, huge pooja pandal, the artwork of Kolkata's amazing artwork is found. In such an environment, the capital of West Bengal is rising from Kolkata, public welfare voice of goodwill, morality and disenchantment is being heard in the whole world, and it is also trying to make the masses accessible, beautiful, pleasant and peaceful. Behind all these, there is a sense of human welfare of a nationalist, Mahayogi, Mahapatu, monolithic Parivrajak and representative of Lord Mahavira, a famous scholar of Jain Shvetambar Teerapanth Dharma Sangh, Acharyashree Mahasramanji. Presently, in the Mahasamaran Vihar, situated in Rajarhat, Kolkata, the fourth year of 2017 is accomplishing. Not only this Chaturmas of Acharyashree, Kolkata is providing inspiration for peace and harmony in entire West Bengal. Also, its echo is not heard across the country on foreign soil. By attracting the human society, every day, in the presence of such people, they are reaching out and listening to their Mangalvaan and trying to make their lives peacefully, amicable and happy.

On Monday, such a great general, Acharyashree Mahasramanji, gave holy inspiration to devotees and devotees on the basis of Thanan Agam on the basis of Thanan Sampoorna, in the time of sickness like sickness, and said that the body has been described as a temple of the devotees. Therefore, one should strive to do as much as possible, religion, meditation and good deeds, while living healthy.

Acharyashree gave holy inspiration and said that if a person has a disease in his body, then he should try to tolerate equality and should try to maintain morale. In spite of being ill, the man should try to do his own work as much as possible by keeping the morale alive. We should strive to continue working as much as possible without keeping ourselves feeling ill and ill. Therefore, should try to keep equality as much as possible. Efforts should be made to develop a sense of friendship in a proper manner. It is a special thing for a person to maintain morale in sickness, bear with equanimity. Due to tolerance of disease, it can also be the heart of man's deeds.

Acharyashree, giving inspiration to the people to become self-reliant, said that there is no sorrow in accordance with Parivshata and there is no happiness like Swavalamban. That's why a man should try not to be too dependent of others in the state of the disease and should try to complete his own work. Physiotherapy of the disease is also possible, but should also try to use the spiritual healing in the disease. For this, through effort, chanting, meditation, self-meditation etc., efforts should be made to make the mind calm and stable and man can save the disease from equality, and the soul can become pure and the soul can become pure. Therefore, man should also strive to maintain equality and peace in the disease. Acharyashri also described the effective number of Sadhus-Sadhvi and Shravak Samaj associated with the Teerapanth Dharma Sangh after the Mahaprana of Mahamana Acharya Bhikshu in 'Tharapanth Prabodh' narrative series.

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