20.09.2017 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 20.09.2017
Updated on: 22.09.2017

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Proud to be Bhartiye.. watch & #share भारत को कोई झुका नहीं सकता था.. अगर आप संकल्प लेंगे तो काम क्यों नहीं होगा? स्वाभिमान जाग्रत करो.. इतिहास पढो.. पहले हर चीज़ में management था.. खूब निर्यात होता था तो भी पर्याप्त था.. आपके पास गौरव का और स्वाभिमान का अभाव हैं मैं नहीं मानता 🤔 -आचार्य विद्यासागर जी महाराज #BeBhartiya #AcharyaVidyasagar

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❖ श्रवणबेलगोला में बाहुबली भगवन का महामस्तका अभिषेक 12 वर्षो में ही क्यों होता है #BahubaliBhagwan #Gomesthwar #Shravanbelgola

प्रश्न: श्रवणबेलगोला में बाहुबली भगवन का महामस्तका अभिषेक 12 वर्षो में ही क्यों होता है?
उत्तर: आचार्य भद्रबाहु 12000 मुनियो के संघ के साथ यहाँ आये थे, उन्होंने 12 वर्ष का सल्लेखना व्रत लिया था इसलिए भी!, बाहुबली जी के इस मूर्ति को बनने में 12 वर्ष लगे, खुद बाहुबली जी ने 12 महीने तक कठोर तप किया!

प्रश्न: विश्व की सबसे प्राचीनतम लिपि कौन-सी है?
उत्तर: प्राचीन ग्रंथो में उल्लेख है कि तीर्थंकर ऋषभदेव के ब्राह्मी और सुंदरी दो पुत्रिया थी! बाल्यअवस्था में वे ऋषभदेव कि गोद में जाकर बैठ गई! ऋषभदेव ने उनके विद्याग्रहण का काल जानकर उन्हें लिपि और अंको का ज्ञान दिया! ब्राह्मी दायी-और तथा सुंदरी बायीं-और बैठी थी! ब्राह्मी को वर्णमाला का बोध कराने के कारण लिपि बायीं और से लिखी जाती है! सुंदरी को अंक का बोध कराने के कारण अंक दायी से बायीं और इकाई, दहाई....के रूप में लिखे जाते है! ऋषभदेव ने सर्वप्रथम ब्राह्मी को वर्णमाला का बोध कराया था, इसी कारण सभी भाषा वैज्ञानिक एकमत से स्वीकार करते है कि विश्व कि प्राचीनतम लिपि ब्राह्मी है!

प्रश्न: 24 तीर्थंकरो के जो चिन्ह है वो कहा से आए या किसने रखे और उनका महत्व क्या है?
उत्तर: इस बारे में ग्रंथो में दो बाते मिलती है!
1. तीर्थंकर बालक के जन्म से ही दाहिने पैर के अंगूठे पर ये चिन्ह होता है और जब सौधर्म इंद्र तीर्थंकर बालक को लेकर पाण्डुक शीला, सुमेरु पर्वत जन्म अभिषेक के लिए जाता है तो इंद्र उस चिन्ह को देख कर घोषणा करता है की ये इन तीर्थंकर का चिन्ह होगा जैसे महावीर स्वामी का शेर! इसी से ही तीर्थंकर की पहचान होती है!
2. जब सौधर्म इंद्र तीर्थंकर बालक को लेकर सुमेरु पर्वत जन्म अभिषेक के लिए जाता है तो इंद्र के रथ की झंडे की ध्वजा में उस समय जो चिन्ह दिखाई देता है इंद्र उसको ही उन तीर्थंकर का चिन्ह घोषित कर देता है!

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News in Hindi

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आचार्य विद्या सागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य क्षुल्लक श्री ध्यान सागरजी महाराज के द्वारा भक्तामर स्तोत्र पर प्रवचन -

https://youtu.be/58F0UV8Ufk4

पैठण के अतिशयकारी #मुनिसुव्रतनाथ भगवान् के दर्शन कर अतितृप्त हुईं आर्यिका श्री ज्ञानमती माता जी (ससंघ) #AryikaGyanmati #Paithan #MuniSuvratnath

Ganini Pramukha Aryika Shri Gyanmati Mataji is considered as an iconic Jain nun, known for undertaking several projects related to Jainism. The Ganini Pramukh Āryikā is considered as the legendary figure reflecting the true spirit of Jainism among the disciples. She is also eminent for construction of the Jain temples representing Jain cosmology models at Jambudweep, Hastinapur, Uttar Pradesh, which were supported by former Prime Minister of India, Indira Gandhi.

About Paithan -This holy & ancient pilgrimage place is situated at Paithan, an old city –that was famous as Pratishthanpur in it’s golden era. This Kshetra is situated at the beautiful bank of river Godavari. It is said that this Kshetra belongs to fourth era and the principal deity of this Kshetra is Bhagwan Munisuvrat Nath—the 20th Teerthankar contemporary to Bhagvan Ram. According to sayings Shri Ram Chandraji worshiped this magnificent idol. This is said that at the time of twelve years drought [in 3rd century], during the migration by Antim Shrut-Kevli Acharya Bhadrabahu with his scholar-the famous Mourya Emperor Chandra Gupta and 12000 monks, Acharya Bhadrabahu came here. Later on Vishakhaacharya and Kalkaacharya also visited Paithan.

A story is very popular regarding miracles of this place. During 17th century Shri Chimna Pandit- a scholar of Bhattarak Ajitkeerti lived here, he was a great poet of Marathi language. Great hindu saint Shri Eknathji and a muslim saint were his friends. One day these three were discussing about spiritual maters, one of them asked to Chimna Pandit about date [tithi] of that day. Chimna Pandit answered that it is the day of full moon [Poornima], both the friends laughed at this answer and told him that this is the day of Amaavasyaa [the day of moon less night]. But Pandit denied this fact again and again. At last they decided to confirm the truth at night. After some time Chimna Pandit recalled the fact and he felt in great sorrow, then he went to the temple direct and stayed before Bagvan Munisuvrat Nath’s idol for prayer, he engrossed himself in devotion. At night all saw that the moon was shining in the sky of Paithan and closer area. This was the miracle of Paithan’s Bhagvan Munisuvrat Nath.

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