09.08.2017 ►TSS ►Terapanth Sangh Samvad News

Posted: 09.08.2017
Updated on: 10.08.2017

Update

👉 #राजारहाट, #कोलकत्ता: महीने भर चली "#प्रेक्षाध्यान #कार्यशाला" परिसम्पन्न
👉 #विजयनगर (#बेंगलोर) - #तेयुप द्वारा #सेवा कार्य
👉 #नोखा - #मासखमण तप अभिनन्दन
👉 #भीलवाड़ा: #अणुव्रत #समिति के तत्वावधान में बच्चों के मध्य 'अणुव्रत आचार संहिता'-"#लेखन #प्रतियोगिता" का आयोजन

प्रस्तुति: 🌻 *#तेरापंथ #संघ #संवाद* 🌻

👉 मानसा - तप अभिनन्दन का कार्यक्रम

👉 #राजरहाट, कोलकत्ता - ज्ञानशाला दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में दक्षिण हावड़ा ज्ञानशाला ने प्राप्त किया द्वितीय स्थान
👉 राजरहाट, #कोलकाता - ज्ञानशाला दिवस का आयोजन
👉 राजरहाट, कोलकत्ता में आयोजित #ज्ञानशाला #दिवस पर पूर्वांचल ग्रुप को प्रथम पुरस्कार
👉 #छापर - कन्यामण्डल अधिवेशन में प्राप्त पुरस्कारों की सदन की समक्ष जानकारी
👉 #मदुरै - रक्षाबंधन पर विशेष कार्यक्रम
👉 #जयपुर - महिला मंडल, सी स्किम द्वारा भाषण प्रतियोगिता
👉 #राजाराजेश्वरी नगर(#बेंगलोर) - नि: शुल्क ब्लड शुगर जाँच शिविर का आयोजन
👉 #हुसटन (#अमेरिका) - समर कैंप का आायोजन
👉 #रायपुर - छतीसगढ़ स्तरीय अणुव्रत नैतिक गीत गायन प्रतियोगिता

प्रस्तुति- *#तेरापंथ संघ संवाद*

Update

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#जैनधर्म की #श्वेतांबर और #दिगंबर #परंपरा के #आचार्यों का #जीवन वृत्त शासन श्री साध्वी श्री संघमित्रा जी की कृति।

📙 *जैन धर्म के प्रभावक आचार्य'* 📙

📝 *श्रंखला -- 122* 📝

*आगम युग के आचार्य*

*नयनानंद आचार्य नंदिल*
*और*
*आचार्य नागहस्ती*

वाचक परंपरा में आचार्य मंगू के बाद आचार्य नंदिल और आचार्य नागहस्ती का उल्लेख है। वाचनाचार्य क्रम में आचार्य नंदिल का क्रम 17वां और आचार्य नागहस्ती का क्रम 18वां है।

युगप्रधान पट्टावलीकारों ने आचार्य नागहस्ती को युगप्रधान माना है।

वाचक नागहस्ती एवं युगप्रधान नागहस्ती दोनों एक नहीं है।

वाचक नागहस्ती वाचनाचार्य नंदिल के शिष्य हैं। युगप्रधान नागहस्ती युग प्रधान आचार्य वज्रसेन के शिष्य हैं। इनको नागेंद्र के नाम से पहचाना गया है। युगप्रधान पट्टावली में आचार्य नागेंद्र का ही नागहस्ती के नाम से उल्लेख है। वाचनाचार्य नागहस्ती विद्यासिद्ध आचार्य पादलिप्त के गुरु हैं। ये आचार्य आर्य रक्षित से पूर्ववर्ती हैं। अनुयोग द्वार में आचार्य आर्य रक्षित ने आचार्य पादलिप्त का *'तरंगवइकार'* के रूप में स्मरण किया है। आचार्य वज्रसेन के शिष्य युगप्रधान नागहस्ती आचार्य आर्य रक्षित से उत्तरवर्ती हैं।

आचार्य देववाचक ने नंदी स्थविरावली में नागहस्ती से संबंधित वाचकवंश की श्रीवृद्धि की कामना की है पर उसमें नाइली शाखा का उल्लेख नहीं है। नाइली शाखा का जन्म युगप्रधान नागहस्ती (नागेंद्र) से हुआ। इससे स्पष्ट है वाचनाचार्य नागहस्ती और युगप्रधान आचार्य नागहस्ती दोनों भिन्न हैं।

*गुरु-परंपरा*

नंदी स्थविरावली में आचार्य मंगू के बाद आचार्य धर्म, भद्रगुप्त, वज्रस्वामी एवं आचार्य आर्य रक्षित का क्रम है। उसके बाद आचार्य नंदिल का उल्लेख है।

आचार्य नंदिल के बाद आचार्य नागहस्ती का उल्लेख है। चूर्णिकार जिनदास महत्तर, टीकाकार आचार्य हरिभद्र और मलयगिरि आचार्य धर्म से आचार्य आर्य रक्षित तक चारों आचार्यों का उल्लेख करने वाली गाथाओं को प्रक्षिप्त मानकर आचार्य मंगू के बाद आचार्य नंदिल का क्रम स्वीकार करते हैं।

आचार्य नंदिल के बाद आचार्य नागहस्ती का उल्लेख है। चूर्णिकार एवं टीकाकार आचार्यों ने धर्म, भद्रगुप्त, वज्रस्वामी, आर्य रक्षित इन चारो आचार्यों का संबंध वाचक परंपरा के साथ मान्य नहीं किया है। यही कारण है जिनदास महत्तर एवं हरिभद्र आदि की नंदी चूर्णि एवं नंदी टीका में इन आचार्यों का उल्लेख नहीं है। चूर्णिकार जिनदास महत्तर एवं टीकाकार हरिभद्र के अभिमत से ये चारों आचार्य युगप्रधान थे। वाचनाचार्य कर्म में आचार्य मंगू के शिष्य आचार्य नंदिल और नंदिल के शिष्य नागहस्ती थे।

दिगंबर परंपरा में आचार्य मंगू और आचार्य नागहस्ती का उल्लेख है। दोनों को चूर्णिकार यतिवृषभ का गुरु माना गया है। दिगंबर परंपरा सम्मत मंगू और नागहस्ती तथा श्वेतांबर परंपरा सम्मत मंगू और नागहस्ती यह भिन्न हैं या अभिन्न, यह अभी तक गंभीर शोध का विषय है।

*आचार्य नंदिल और आचार्य नागहस्ती के जीवन-वृत्त* के बारे में पढ़ेंगे... और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...

प्रस्तुति --🌻#तेरापंथ #संघ #संवाद🌻
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आचार्य श्री तुलसी की कृति आचार बोध, संस्कार बोध और व्यवहार बोध की बोधत्रयी

📕सम्बोध📕
📝श्रृंखला -- 122📝

*व्यवहार-बोध*

*समय प्रबंधन*

*(लावणी)*

*57.*
जीवन की बड़ी कला है समय-नियोजन,
'समयं गोयम! मां पमायए' परियोजन।
समयज्ञ विवेकी इसकी कीमत आंके,
मुनि अहालंद जागरणा, भीतर झांके।।

*31. जीवन की बड़ी कला...*

जीवन की एक कला है समयनियोजन। समयनियोजन के अनेक रूप हैं। उसका एक रुप है— निश्चित समय पर काम करना। उसका दूसरा रुप है— एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोना। भगवान महावीर ने अपने शिष्य इंद्रभूति गौतम को संबोधित कर कहा— 'समयं गोयम! मा पमायए'— गौतम! तुम एक क्षण भी प्रमाद मत करो।' शास्त्रों में प्रथम प्रहर में स्वाध्याय, दूसरे में ध्यान, तीसरे में गोचरी और चौथे में पुनः स्वाध्याय करने की व्यवस्था समय का सदुपयोग करने की दृष्टि से दी गई है, ऐसा प्रतीत होता है।

प्राचीनकाल में साधु प्रातःकाल आचार्य से निवेदन करते— 'भंते! आप मुझे किसी काम में नियोजित कर दें। सेवा की अपेक्षा हो तो मैं सेवा के लिए प्रस्तुत हूं। स्वाध्याय करना हो तो उस में संलग्न हो जाऊं।' शिष्य का निवेदन और गुरु का निर्देश समय के सम्यक् नियोजन का संकेत है।

प्रमाद से बचने अथवा समय का मूल्यांकन करने की दृष्टि से अहालंद मुनि को आदर्श माना गया है। जैनागमों में मुनि की कई श्रेणियां बताई गई हैं—
🔹जिनकल्पी
🔹अभिग्रहधारी
🔹परिहारविशुद्धि
🔹अहालंदक

अहालंद मुनि की साधना सतत अप्रमाद की साधना है। लंद का अर्थ है कालविशेष। इसमें जघन्य अंतर्मुहूर्त्त और उत्कृष्ट पांच दिन-रात तक अप्रमत्त रहने का संकल्प स्वीकार किया जाता है। संकल्पित अवधि में हाथ की रेखा सूखे, उतने समय भी प्रमाद हो जाए तो उसे दो उपवास का प्रायश्चित्त प्राप्त होता है। ऐसे अप्रमत्त साधुओं को आदर्श रुप में सामने रखकर समय का सम्यक् उपयोग किया जा सकता है। उन जैसा न बना जाए तो उस दिशा में प्रस्थान तो अवश्य किया जा सकता है।
(बृहत्कल्प भाष्य गाथा 1438)

*विवेक जागरण* के बारे में पढेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...

प्रस्तुति --🌻तेरापंथ संघ संवाद🌻
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