20.04.2017 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 20.04.2017
Updated on: 21.04.2017

Update

भक्ति निःस्वार्थ होना चाहिए -आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी @ डोंगरगढ़ exclusive 😊

छत्तीसगढ़ के प्रथम दिगम्बर जैन तीर्थ चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी के षिष्य मुनि श्री निर्दोष सागर जी ने रविवार को हुये प्रवचन में कहा की आचार्य श्री कहते है कि भक्त कि भक्ति निःस्वार्थ होना चाहिए जिसमे किसी भी प्रकार की फल की प्राप्ति की कामना नही होना चाहिए तभी वह भक्ति सच्ची भक्ति होती है। उन्होने उदाहरण के माध्यम से समझाया कि भक्त दो प्रकार के होते है एक भक्त मंदिर में भगवान ने जो छोड़ा है उसकी प्राप्ति के लिये जाते है और दूसरे वे जो भगवान ने प्राप्त किया है उसे प्राप्त करने के लिये जाते है। हमे मंदिर भगवान से कुछ मांगने नही जाना चाहिए बल्कि उनके जैसा बनने के लिये जाना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि बिना गुरू के लक्ष्य की प्राप्ति संभव नही है। मुनि श्री ने प्रतिभा स्थली की बच्चीयों और चंद्रगिरि प्रांगण में उपस्थित सभी लोगो को स्वस्थ्य और सुखी रहने के 3 मूल मंत्र दिये कि -
खाना कम चबाना ज्याादा। बोलो कम विचारो ज्यादा। बड़ो से विनय और छोटा से स्नेह करो!

मुनि श्री योग सागर जी ने कहा कि - दान परिग्रह का प्रायष्चित है इसमे अहंकार नही होना चाहिए। यदि आप दायें हाथ से दान कर रहे हो तो आपके बाएँ हाँथ को भी इसका पता नही चलना चाहिए। एक दृष्टांत के माध्यम से दान की महिमा बताई कि दान सिर्फ अमीर व्यक्ति ही नही कर सकते बल्कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी दान कर सकते है। उन्होने बताया कि एक गरीब किसान किसी महाराज जी के दर्षन करने को पहुंचा तो वह महाराज जी से कहने लगा कि मै बहुत गरीब हूँ मै तो कुछ भी दान नही कर सकता तो महाराज जी ने किसान से पूछा कि आप कितनी रोटी खाते है तो किसान ने कहा कि वह 6 रोटी खाता है तो महाराज ने कहा कि आप 5 रोटी खाएँ और 1 रोटी को दान कर दे। यह सुनकर किसान बहुत प्रसन्न हुआ और उसकी दान करने के भाव इतने निर्मल थे कि वह बहुत खुषी - खुषी यह कार्य रोज करने लगा तो एक दिन स्वर्ग से एक देव उसकी परीक्षा के लिये पृथ्वी पर सिंह का रूप धारण कर मंदिर में घुस गये तो गाँव के सभी लोग डर के कारण मंदिर में प्रवेष नही कर रहे थे और काफी भीड़ मंदिर के बाहर जमा हो गयी तब किसान रोज कि तरह मंदिर में 1 रोटी चढ़ाने आया तो उसको लोगो ने रोका की अंदर मत जाओ वहाँ सिंह बैठा है तो उस किसान ने कहा मुझे जाने दो और वह किसी कि नही सुना और मंदिर के अंदर गया और रोज कि तरह 1 रोटि मंदिर में दान किया और अपने काम के लिये चला गया कुछ समय बाद देव किसान के पीछे - पीछे गये और अपने असली स्वरूप में आये और किसान के पैर पड़े और कहा आपका त्याग धन्य है और आपकी भक्ति भी सच्ची है। फिर एक दिन गाँव में राजकुमारी का स्वयंबर था तो वह किसान भी राजा के दरबार में स्वयंबर देखने गया था वह दूर एक पेड़ के नीचे बैठा था और वहाँ राजमहल में कई राजकुमार सजे - धजे हुये आसन पर विराजमान थे तभी राजकुमारी वर माला लेकर आयी और बारी - बारी सभी विराजमान राजकुमारों को देखने लगी फिर पास में खड़े पूरे गाँव वालो को एक - एक कर देखा फिर वह राजकुमारी माला लिये किसान के पास गयी और उसके गले में वर माला डाल दी। राजकुमारी से जब पूछा गया कि अगर गाँव के गरीब किसान से ही शादी करनी थी तो इन राजकुमारों की बेजती करने क्यों राज महल के दरबार में उन्हे बुलाया तो राजकुमारी ने शालिनता से कहा कि मैने किसान के मस्तिष्क पर चंदन का तिलक देखकर उसके गले में वर माला डाली जबकि उस समय उस दरबार में किसी भी राजकुमार एवं प्रजा के माथे पर चंदन का तिलक नही था। मुनि श्री ने इस दृष्टांत के माध्यम से हमे यह समझाया कि दान छोटा या बड़ा नही होता उसके पीछे हमारी क्या भावना है, हमारा विचार कैसा है, हमे संतोष है कि नही यह मायने रखता है। उन्होने कहा कि सुख साधन में नही साधना में है। मुनि श्री ने कहा आप विद्यासागर क्यों नही बन पा रहे? उन्होने कहा कि विद्यासागर बनने के लिये गुरू चरण के साथ - साथ उनका आचरण भी हमें अपनाना चाहिये। गुरू चरण तो छू लिया तूमने तो कई बार एक बार आचरण को छू लो तो हो जाये भव सागर पार।

💐-चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निषांत जैन

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News in Hindi

Jainism = Compassion = Religion

If there is no compassion towards all living beings then there cannot be any religion. Compassion is the essence of all religions. How do you feel when someone hurts you? Do you like it? Of course, you don't.

Now, think about how others feel if we hurt them. Do they feel good? Naturally, they will feel bad.

Lord Mahavira said you should not say or do anything to others that you would not like to have done to you. Everybody in this world wants to be happy. No one likes to be hurt.

The message of Lord Mahavira is that we should love everybody and should not hurt anybody. We should try to help others and make them happy. To understand the pain and unhappiness that others are experiencing is compassion. The same is true about nonviolence (Ahimsa). Compassion is one of the main pillars of the Jain Religion, and that is why Jainism is sometimes called a compassionate religion.

Ahimsa (nonviolence) has been given the most importance in Jainism. Lord Mahavira became Arihanta (to know more about Arihanta, refer post no # 38) by adopting supreme compassion in his life. His compassion seems to have reached the climax. He was tortured by many and even then not only he forgave them but he felt compassionate towards them.

Compassionate people are rewarded by acquiring other virtues. Jainism is based on compassion to all the living beings. Jainism emphasizes observance of verbal and mental compassion also. We should be compassionate and friendly towards all and should have no enmity for any one.

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