Chobisi ►20 ►Stavan for Bhagwan Munisuvratnatha

Posted: 14.04.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji
Acharya Jeetmal
 

Language: Rajasthani:
 

20~~तीर्थंकर मुनिसुव्रत प्रभु

प्रभू जी! आप प्रबल बड़ भागी।
त्रिभुवन दीपक सागी रा।।

सुमित्रनन्दन श्री मुनि सुव्रत,जगतनाथ जिन जाणी।
चारित्र ले केवल उपजायो, उपशम रस नीं वाणी रा।।१।।

चौतीस अतिशय पैंतीस वाणी, निरखत सुर इन्द्राणी।
संवेग रस नीं वाणी सांभल,हरष स्यूं आंख्यां भराणी रा।।२।।

शब्द -रूप-रस-गंध-फरस,प्रतिकूल न हुवै तुम आगै।
पंच दरशन थांस्यूं पग नहिं मांडै,(तिम) अशुभ शब्दादिक भागेै रा।।३।।

सुर कृत जल स्थल पुष्प पुँजवर,ते छांडी चित दीनो।
तुझ निश्वास -सुगंध मुख -परिमल,मन -भ्रमर महा लीनो रा।।४।।

पंचेन्द्री सुर नर तिरि तुम स्यूं,किम होवै दुखदायो।
एकेन्द्री अनिल तजै प्रतिकूलपणुं,बाजै गमतो वायो रा ।।५।।

रागद्वेष दुर्दत तै दमिया,जीत्या विषय विकारो।
दीनदयाल आयो तुम सरणै,तूं गति-मति-.दातारो रा ।।६।।

उगणीसै आसोज तीज  तिथि,श्री मुनिसुव्रत गाया।
लाडनूं शहर मांहि रुड़ि रीते,आणंद अधिको पाया रा।।७।।

 

Lord Munisuvrata
Bhagwan Munisuvratnatha


Tortoise
Symbol - Tortoise


 

 

 

 

20

Stavan for Bhagwan Munisuvratnatha

 

Acharya Tulsi

7:40

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

5:35

Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

अर्थ~~20~~तीर्थंकर मुनिसुव्रत प्रभु

प्रभो! तुम बहुत सौभागी हो और इस त्रिभुवन को प्रकाशित करने के लिए साक्षात् दीपक हो।

सुमित्र राजा के पुत्र मुनिसुव्रत प्रभु! तुम जगत् के नाथ हो। तुमने चारित्र स्वीकार कर केवलज्ञान प्राप्त किया ।तुम्हारी वाणी उपशम रसमय थी।

प्रभो!तुम्हारे चौंतीस अतिशय और पैंतीस वचनातिशयों को देव और इन्द्राणी भी देखते हैं। तुम्हारी संवेग रस से भरी हुई वाणी सुनकर उनकी आंखे हर्ष के आंसुओं से भर जाती हैं।

प्रभो! तुम्हारे सामने शब्द,रूप,रस,गंध,और स्पर्श प्रतिकूल नहीं होते।जैसे पांच दर्शनी(बौद्ध,नेयायिक,सांख्य,वैशेषिक और मीमांसक)तुम्हारे सामने पैर रोप ठहर नहीं पाते,वैसे ही अशुभ शब्द आदि तुमसे दूर भाग जाते है ।

समवसरण में देवों द्वारा बरसाये गये जलज और स्थलज पुष्पसमूह को छोड़कर भक्तो ने अपना चित्त तुम्हारे निश्वास रूपी सौरभ पर और अपने मन -भ्रमर को तुम्हारे मुख-परिमल पर पूर्णरूप से समर्पित कर दिया।

पांच इन्द्रिय वाले देव,मनुष्य और तिर्यंच तुम्हारे लिए दुःखद कैसे हो सकते है? एक इन्द्रिय वाली वायु भी प्रीतकूल नहीं होती,वह भी सदा अनुकूल रहती है।

प्रभो! तुमने दुर्दान्त राग और द्वेष का दमन किया।विषय विकारों पर विजय प्राप्त की।हे दीनदयाल! मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ।तुम गति और मति देने वाले हो।

प्रभो! मैंने तुम्हारा  भलीभांति गुणगान किया,इससे मुझे अतिशय आनंद मिला।

रचनाकाल -विं. सं.१९००,आश्विन कृष्णा तृतीया,रचनास्थल लाडनूँ।

 

English Translation:

20th Tirthankara Muni Suvrat Natha

Lord! You are very auspicious and truly like the lamp to enlighten the universe.

Lord Suvrat! You are the son of king Sumitra. You are the sovereign of universe. You availed the Keval Gyan by accepting the Charitra. Your heavenly voice is filled with the delight of Upasham.

Lord! Deva and Indrani also observe your Chauntis (34) Atishaya (abundant merits) and Paintis (35) Vachanatishaya (exuberant voice). Their eyes get tearful by listening your heavenly voice which is swarmed with the delight of impulse.

Lord! Shabd (Word), Roop (aspect), Rasa (Taste), Gandh (Smell) and Sparsh (Contact) never get prejudiced in front of you. Obscene words despise from you just like five philosophies - Boddha, Neyayik, Sankhya, Vaisheshak and Mimansak, who are unable to get standing capacity in their feet before you.

The devotees have dedicated their Chitta on the aroma of your breathing out and their psyches which are like bumblebees, on the aura of your heavenly face, except the aquatic and overland flowers shower down by Devas in the Samavasarana.

How can Deva, Manushya and Tiryyanch of Panchendriya living ones be onerous for you, when even the Ekendriya living one, the wind can not annoy you, it becomes favorable for you, forever.

 Lord! You have overwhelmed the terrible Raga and Dvesha and vanquished the lust. O merciful! I am in your holy protection. You are the only one who gives progress and intellectual development.

Lord! I have thoroughly glorified you and by this, I got an extreme rejoice.

Time of Composing: V.S 1900, 3rd day of Krishna Ashwin.
Place: Ladnun

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