Chobisi ►19 ►Stavan for Bhagwan Mallinatha

Posted: 13.04.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji
Acharya Jeetmal
 

Language: Rajasthani:
 

19 ~~ तीर्थंकर मल्ली प्रभु

मल्ली जिनेश्वर नाम समर तरण शरण आयो।

नील वर्ण मल्ली जिनेश्वर,ध्यान निर्मल ध्यायो।
अल्प काल मांहि प्रभु,परम ज्ञान पायो।।१।।

कल्प पुष्पमाल जेम, सुगंध तन सुहायो।
सुर - वधु वर नयन - भ्रमर,अधिक ही लिपटायो।।२।।

स्व पर चक्र विविध विघन,मिटत तो पसायो।
सिंघनाद थकी गजेन्द्र,जेम दूर जायो।।३।।

वाण विमल निमल सुधा - रस संवेग छायो।
नर सुरासर तिरी समाज,सुणत ही हरषायो।।४।

जगदयाल तूं हि कृपाल,जनक ज्यूं सुखदायो।
वच्छल नाथ स्वाम साहिब,सुजम तिलक पायो।।५।।

जपत जाप खपत पाप,तपत ही मिटायो।
मल्लिदेव त्रिविध सेव,जग अछेरा पायो।।६।।

उगणीसै आसोज कृष्ण,तीज़ सुदिन आयो ।
कुम्भ -नन्द कर आनन्द हरष थी मैं गायो।।७।।

 

Lord Mallinath
Bhagwan Mallinatha


Kalasha (Jar)
Symbol - Kalasha (Jar)


 

 

 

 

19

Stavan for Bhagwan Mallinatha

 

Acharya Tulsi

6:03

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

5:25

Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

अर्थ~~19~~तीर्थंकर मल्लि प्रभु

अर्हत् मल्लि के नाम का सुमिरन करें। मल्लिप्रभो! संसार से पार पहूंचने के लिए मैं तुम्हारी शरण मेँ आया हूँ।

तुम्हारा वर्ण नील है।तुमने निर्मल ध्यान किया  और अल्पकाल में (एक प्रहर के बाद)परमज्ञान(केवलज्ञान) पा लिया।

प्रभो! तुम्हारे शरीर से कल्पवृक्ष की पुष्पमाला जैसी सुगन्ध फुट रही थी। देवांगनाओं के नयन रूप भ्रमर उसके प्रति आकर्षित हो झूम रहे थे।

प्रभो! तुम्हारे प्रसाद से स्वचक्र -परचक्र के भय और विविध विघ्न वैसे ही दूर हो जाते हैं, जैसे सिंहनाद सुनकर गजेन्द्र।

तुम्हारी वाणी विमल सुधारस  और निर्मल संवेंग रस से भावित है।उसे सुनते ही मनुष्य,देव,असुर और तिर्यञ्च सब हर्षित होते है।

प्रभो! तुम जगत के प्रति दयालु,कृपालु और माता - पिता के समान सुखदायक हो।तुमने वात्सल्य और सरंक्षण देकर सुयशतिलक प्राप्त कर लिया।

तुम्हारा जाप जपने से  पाप-क्षय हो जाता है और संताप मिट जाता है। प्रभो तुमने त्रिविध (मानसिक,वाचिक और कायिक)उपासना द्वारा स्त्रीरूप में तीर्थंकर बनकर जगत को आश्चर्य में डाल दिया।

मेरे लिए आज का दिन सुदिन है।हे कुम्भनन्द!मेने हर्ष -विभोर और आनन्दित होकर तुम्हारा  गुणगान किया।

रचनाकाल -वि.सं.१९००,आश्विन कृष्णा तृतीया।

 

English Translation:

19th Tirthankara Mallinatha.

We should recite Arhat Mallinatha. I have come in your patronage to pass over the earthly concern.

Your colour is blue. You practiced the vestal meditation and availed the absolute knowledge - Keval Gyan in a very short period Antaramuhurta.

Lord! A fragrance like the coronet of Kalpavriksha was erupting from your body. Eyes of divas like the bumblebees were flaunting in the attraction of your body.

Lord! Fear of all circumferences of ours or others and multiple obstructions get away In your patronage, Just as an elephant does while hearing the roar of a lion.

Your heavenly voice is filled with the ambrosia and vestal delight of impulse. Manushya, Deva, Asura and Tiryanca all get rejoiced by listening this.

Lord! You are merciful, pitiful and gratifying like the parents towards the universe. You have availed the glory by giving parental affection and patronage.

Sins get diminished and sorrows get vanished by chanting your name. You stunned the universe by being a female Tirthankara with the help of triplex - Manasik (psychological), Vachik (vocal) and Kayik (physical) practise.

Today is a fortunate day for me. O Lord! I have recited you with full of pleasure and rejoice.

Time of Composing: V.S 1900, 3rd day of Krishna Ashwin.

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