Chobisi ►18 ►Stavan for Bhagwan Aranatha

Posted: 12.04.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji
Acharya Jeetmal
 

Language: Rajasthani:
 

18~~तीर्थंकर अर प्रभु

मोनैं प्यारा लागै छै जी अर जिनराज।
मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।

अर जिन कर्म-अरी नां हंता,जगत उधारण ज्हाज।
मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।१।।

पसिषह उपसर्ग रूप अरी हण,पाया केवल पाज।
मोनै वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।२।।

नेण न धापै निरखतांजी,इन्द्राणी सुरराज।
मोनै वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।३।।

वारू रे जिनेश्वर रूप अनूपम,तू सुगणा -सिरताज।
मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।४।।

वाण विशाल दयाल -पुरूष नीं,भूख तृषा जाए भाज।
मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।५।।

शरणै आयो स्वाम रै जी,अविचल सुख नै काज।
मौनै वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।६।।

उगणीसै आसू बिद एकम,आणन्द उपनौं आज।
मोनैं वाल्हा लागै छै जी अर जिनराज।।७।।

 

Lord Rishabhadev
Bhagwan Aranatha


Bull
Symbol - Bull


 

 

 

 

18

Stavan for Bhagwan Aranatha

 

Acharya Tulsi

4:59

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

4:40

Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

अर्थ~~18~~तीर्थंकर अर प्रभु

अर प्रभो! तुम मुझे प्रिय और वल्लभ लगते हो।

प्रभो! तुम अहितकर कर्मो को प्रतिहत केरने वाले हो और संसार-समुन्द्र से उद्धार करने के लिए जलपोत के समान हो।

आत्महित में बाधक परिषय और उपसर्गों को अभिभूत कर तुमने केवलज्ञान -रूपी सेतुबंध पा लिया।

तुम्हारे दर्शन करते- करते इंद्र और इन्द्राणी के नयन भी तृप्त नहीं होते।

प्रभो! तुम्हारा बाह्य और आंतरिक रूप अनुपम है।तुम गुणिजनों के सिरताज हो।

प्रभो! तुम दयालु पुरुष हो।तुम्हारी वाणी विशाल है।उसे सुनते -सुनते मनुष्य भूख और प्यास को भी भूल जाता है।

में शाश्वत सुख के लिए तुम्हारी शरण में आया हूँ।

मुझे आज आनंद की अनुभूति हुई ।

रचनाकाल-वि. सं.१९००,आश्विन कृष्णा प्रतिपदा।

 

English Translation:

18th Tirthankara Aranatha

Lord! You are being delightful and dearest to me.

Lord! You are the one who diminishes the harmful Karma and an executor like the hydroplane to emancipate from earthly concern.

You have availed the pier like Keval Gyan by vanquishing the soreness and harassment filibusters in the self-interest.

Even Indra and Indrani's eyes also do not get appeased by seeing you.

Lord! Your internal and external beauty is unique. You are the sovereign of proficients.

Lord! You are merciful. Your heavenly voice is magnificent. One forgets even hunger and thirst while listening to you.

I have come in your patronage for the perpetual pleasure.

I felt a great rejoice today.

Time of Composing: V.S 1900, 1st day of Krishna Ashwin.

Share this page on: