29.03.2016 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 29.03.2016
Updated on: 05.01.2017

Update

kal acharya shri ka Kundalpur, Bade baba ke charno me pravesh!!

आज के दिन आचार्य श्री विद्यासागरजी महामुनिराज ने 37 वर्ष पूर्व अपने कर-कमलों से प्रथम मुनि दीक्षा दी थी और वो दीक्षार्थी थे उन्ही विद्यासिन्धु के गृहस्थ जीवन के लघु भ्राता श्री शांतिनाथ मल्लपा जी अष्टगे🙏
और शांतिनाथ जी बने थे मुनि श्री समयसागरजी 🙏

जीवन परिचय🙏 मुनि श्री समयसागरजी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन 26 अक्टूबर 1958 को सदलगा जिला बेलगाँव कर्नाटक में हुआ पूज्य मुनिश्री मल्लपाजी व श्रीमंति जी की तीसरी संतान थी पहली संतान के रूप में महावीरप्रसादजी अष्टगे थे🌁 तो दूसरी संतान के रूप में धरा को धन्य करने का सौभाग्य दिया आज के श्री विद्यासागरजी ने
श्री शान्तिकी लौकिक शिक्षा हाई स्कूल तक ही हो पाई क्योंकि अपने पूर्वोपार्जित संस्कार व माता द्वारा दिए हुए संस्कारों के परिणामस्वरुप अपने अग्रज भ्राता व आचार्य श्री विद्यासागरजी से पारलौकिक शिक्षा ग्रहण कर ली थी📝 🍿

श्रीमहावीरजी(राजस्थान)में जाकर2मई 1975के शुभ दिन आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार कर लिया और उसी वर्ष 19 दिसम्बर को सिद्धक्षेत्र सोनागिरी में अपने लघु भ्राता अनन्तनाथ अष्टगे के साथ क्षुल्लक दीक्षा ले ली 31अक्टूबर 1978 को 🛎🏮दीपावली के पावन दिन आचार्य विद्यासागरजी ने क्षुल्लकजी को एक सीढ़ी उपर चढ़ाते हुए सिद्धक्षेत्र नैनागिरीजी में ऐलक दीक्षा दे दी ⛳
💎संयम के प्रति लगाव को देखते हुए आचार्य विद्यासागरजी ने आज के 37 वर्ष पूर्व सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरजी में महान भवनाशिनी मुनि दीक्षा प्रदान की और समयसागर नाम देकर उत्तम चारित्र से अलंकृत किया🖼
पिछले 37 वर्षों से मुनि श्री आत्म कल्याण के साथ-साथ पर कल्याण में भी लगे है🙏
यूँ तो 🌞अष्टगे परिवार🌞 के सभी सदस्य बहुत ही शान्त स्वभाव के थे परन्तु उन सब में भी अगर शान्ति का स्रोत अगर किसी में बहता था तो वो थे शांतिनाथ अष्टगे और ये बात आज भी स्पष्ट देखी जा सकती है शांतिनाथ से समयसागर बनने तक वह शान्ति अपनी महक फैलाती रही और अब 37 वर्ष के समयसागरजी में भी वही भोलापन वही शान्ति हमें मिल ही जाती है 😊
🔆 आज भी समयसिधु में चतुर्थकाल के शान्त व निस्पृही मुनिराज की अलौकिक छवि के दर्शन होते है🔱 पूर्णतः युगलजी की पंक्तियाँ सार्थक हो जाती है मुनि श्री में
🙏हे गुरूवर! शाश्वत सुखदर्शक यह नग्न स्वरुप तुम्हारा है
जग की नश्वरता का सच्चा दिग्दर्शन करने वाला है💎
🔱जब जग विषयों में रच-पच कर गाफिल निद्रा में सोता हो🔱
💎अथवा वह शिव के निष्कंटक पथ में विषकंटक बोता हो💎
⛳हो अर्ध निशा का सन्नाटा वन में वन चारी चरते हो⛳
🍿तब शान्त निराकुल मानस तुम तत्वों का चिन्तन करते हो🍿
🏉करते तप शैल नदी तट पर तरु तल वर्षा की झड़ियों में 🏉
🏵समता रस पान किया करते सुख दुःख दोनों की घड़ियों में 🏵
🍀अन्तर ज्वाला हरती वाणी मानो झरती हो फुलझड़ियाँ🍀
🌾भव बन्धन तड़-तड़ टूट पड़े खिल जावे अन्तर की कलियाँ🌾
🐚तुम सा दानी क्या कोई हो जग को दे दी जग की निधियाँ 🐚
❄दिन-रात लुटाया करते हो सम-शम की अविनश्वर मणियाँ❄

🙏ऐसे महामनीषी जिनके आभा मंडल में जाते ही तीर्थंकर के समवशरण का अनुभव होता है🔆 ऐसे श्रमण जो हर क्षण आत्म ध्यान में लीन है 🏵जिनके पास कभी काम,क्रोध आदि कषायें भूलकर भी नहीं भटकती🖼 ऐसे वैराग्यपुञ्ज पूज्य गुरूदेव समयसागरजी के चरणों में37 वें दीक्षा दिवस पर अनन्तों नमोस्तु 🙏👏🏻👏🏻

❖ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दुर्लभ प्रवचन हिंदी संस्करण!! -साधु-समाधि सुधा-साधन ❖

हर्ष विवाद से परे आत्म-सत्ता की सतत् अनुभूति ही सच्ची समाधि है।
यहाँ ‘समाधि’ का अर्थ ‘मरण’ है। साधु का अर्थ श्रेष्ठ/अच्छा। अत: श्रेष्ठ/आदर्श-मृत्यु को साधु-समाधि कह्ते है। ‘साधु’ क दूसरा अर्थ ‘सज्जन’ भी है। अत: सज्जन के मरण को भी साधु-समाधि कहेंगे। ऐसे आदर्श–मरन को यदि हम एक बार भी प्राप्त कर लें तो हमारा उद्धार हो सकता है।

जन्म और मरण किसका? हम बच्चे के साथ मिष्ठान वितरण करते हैं। बच्चे के जन्म के समय सभी हंसते हैं, किन्तु बच्चा रोता है। इसलिये रोता है कि उसके जीवन के इतने क्षण समाप्त हो गये। जीवन के साथ ही मरण क भय शुरु हो जाता है। वस्तुत: जीवन और मरण कोई चीज नहीं है। यह तो पुद्गल का स्वभाव है, वह तो बिखरेगा ही।

आपके घरों में पंखा चलता है। पंखे में तीन पंखुडियां होती हैं। पर जब पंखा चलता है तो एक पंखुडी मालूम पड़ती है। ये पंखुडियां उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य की प्रतीक हैं तथा पंखे के बीच का डंडा जो है वह सत् का प्रतीक है। हम वस्तु की शास्वतता को नहीं देखते केवल जन्म-मरण के पहलुओं से चिपके रहते हैं जो भटकाने/घुमाने वाला है।

समाधि ध्रुव है, वहाँ न आधि है, न व्याधि है और न ही कोइ उपाधि है। मानसिक विकार का नाम आधि है। शारीरिक विकार व्याधि है। बुद्धि के विकार को उपाधि कहते हैं। समाधि मन, शरीर और बुद्धि से परे है। समाधि में न राग है, न द्वेष है, न हर्ष है और न विषाद। जन्म और मृत्यु शरीर के है। हम विकल्पों में फंस कर जन्म-मृत्यु का दु:ख उठाते हैं। अपने अन्दर प्रवाहित होने वाली अक्षुण्ण चैतन्य धारा का हमें कोई ध्यान ही नहीं। अपनी त्रैकालिक सत्ता को पहचान पाना सरल नहीं है। समाधि तभी होगी जब हमें अपनी सत्ता की शाश्वत्ता का भाव हो जायेगा। साधु समाधि वही है जिसमें मौत को मौत की तरह नहीं देखा जाता है। जन्म को भी अपनी आत्मा का जन्म नहीं माना जाता। जहां न सुख का विकल्प है और न दु:ख का।

आज ही एक सज्जन ने मुझसे कहा, “महाराज, कृष्ण जयंती है आज”। मैं थोडी देर सोचता रहा। मैंने पूछा, “क्या कृष्ण जयंती मानने वाले कृष्ण की बात आप मानते हैं? कृष्ण गीता में स्वयं कह रहे हैं कि मेरी जन्म-जयंती न मनाओ। मेरा जन्म नहीं, मेरा मरण नहीं। मैं तो केवल सकल ज्ञेय ज्ञायक हूँ। त्रेकालिक हूँ। मेरी सत्ता तो अक्षुण्ण है”। अर्जुन युद्ध-भूमि में खड़े थे। उनका हाथ अपने गुरुओ से युद्ध के लिये नहीं उठ रहा था। मन में विकल्प था की ‘कैसे मारुँ’ अपने ही गुरुओं को। ‘वे सोंचते थे, चाहे मैं भले ही मर जाउँ किंतु मेरे हाथ से गुरुओं की सुरक्षा होनी चाहिए । मोहग्रस्त ऐसे अर्जुन को समझाते हुए श्री कृष्ण ने कहा-

जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवो जन्म मृतस्य च
तस्माद परिहार्येथे न त्वं शोचितुमर्हसि
जिसका जन्म है उसकी मृत्यु अवश्यम्भावी है और जिसकी मृत्यु है उसका जन्म भी अवश्य होगा यह अपरिहार्य चक्र है, इसलिए हे अर्जुन! सोंच नही करना चाहिए। अर्जुन! उठो अपना धनुष और क्षत्रिय-धर्म का पालन करो। सोंचो, कोई किसी को वास्तव में मार नही सकता। कोई किसी को जन्म नही दे सकता। इसलिए अपने धर्म का पालन श्रेयस्कर है। जन्म-मरण तो होते रहते हैं आवीचि मरण तो प्रति समय हो ही रहा है। कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से और हम हैं कि केवल जन्म-मरण के चक्कर में लगे हैं क्योंकि चक्कर में भी हमें शक्कर-सा अच्छा लग रहा है।

तन उपजत अपनी उपज जान
तन नशत आपको नाश मान
रागादि प्रकट जे दुःख दैन
तिन ही को सेवत गिनत चैन

हम शरीर की उत्पत्ति के साथ अपनी उत्पत्ति और शरीर के मरण के साथ अपना मरण मान रहे हैं। अपनी वास्तविक सत्ता का हमको भान नहीं। सत् की ओर हम देख ही नहीं रहे हैं। हम जीवन मरण के विकल्पों में फँसे हैं किंतु जन्म-मरण के बीच जो ध्रुव सत्य है उसका चिंतन कोई नहीं करता। साधु-समाधी तो तभी होगी जब हमें अपनी शाश्वत सत्ता का अवलोकन होगा। अतः जन्म जयंती न मनाकर हमे अपनी शाश्वत सत्ता का ही ध्यान करना चाहिए, उसी की संभाल करनी चाहिए।

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भगवान और गुरु के सामने कभी असमर्थ बनकर मत जाना: सुधासागरजी महाराज

शहरसे सटे ठीकरिया के वीरोदय नगर तीर्थ क्षेत्र में 26 मार्च से श्री अर्हचक्र महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। इसमें वागड़, मेवाड़, गुजरात, मप्र सहित देशभर के जैन समाजबंधु उत्साहसे भाग ले रहे हैं। इस धार्मिक आयोजन में जैन समाज के संतों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है।

सोमवार को मुनि पुंगव सुधासागरजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जैन दर्शन नहीं कहता कि तुम भूखे रहकर दान करो। लेकिन जब नगर और कस्बे में विधान, जिनालय निर्माण, तीर्थक्षेत्र का निर्माण हो रहा हो उस समय तुम अगर दान देने के भाव नहीं बना रहे हो तो समझो कि तुम्हारे अमीरी से गरीबी के दिन शुरू हो गए। ठीक उसी रावण की तरह भोग विलासिता के लिए तो धन था, लेकिन धर्म के लिए नहीं। महाराजश्री ने कहा कि कभी भी भगवान और गुरु के सामने असमर्थ बनकर मत जाना। समर्थवान बनकर जाने से निश्चित तुम्हारा कल्याण होगा। उन्होंने कहा कि जैनियों की अमीरी का रहस्य यही है कि वे भगवान के दर पर लेने नहीं, बल्कि देने जाते हैं। महाराजश्री ने कहा कि पुण्य के फल से ही धर्म और धनवृद्धि होगी।
सम्मेदशिखर की माटी से भरे कलश लेने की लगी होड़: जैसेही मुनि पुंगव सुधासागरजी महाराज ने कहा कि सम्मेद शिखर की माटी को कलशों में भरकर शिलान्यास के दौरान रखा जाएगा। महाराज के ऐसा कहते ही सबसे पहले खांदू कॉलोनी जैन समाज ने 1008 कलश प्राप्त करने की बात कही। वहीं वागड़ देशभर के श्रद्धालुओं की माटी से भरे कलश प्राप्त करने की होड़ लग गई। इस दौरान महाराजश्री ने वीरोदय तीर्थक्षेत्र की महिमा बताते हुए कहा कि एक नगर के मंदिर में चार सौ से पांच सौ श्रद्धालु दर्शन को आएंगे तो आपको दान का छठा भाग पुण्य लगेगा, पर एक तीर्थ क्षेत्र पर पूरे भारत के श्रद्धालु आएंगे तो यह ज्यादा पुण्य लगेगा। नगर के मंदिर से बड़ा तीर्थ क्षेत्र होता है।

ठीकरिया के वीरोदय तीर्थ क्षेत्र में धर्मसभा को संबोधित करते सुधासागरजी ससंघ

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Breaking News: संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर श्री विद्या सागर जी महाराज का ससंघ मंगल प्रवेश कल दिनाँक 30 मार्च बुधवार को सिद्ध क्षेत्र कुङलपुर में हाेने जा रहा है आप सभी साधरमी अवश्य पधारकर सौभाग्य प्राप्त करें

🔔 Acharya Shri.. Kundalpur ki or badhte hue (Bade baba nd unki Jivant prakitri ko eksath dekhne ka avsar)

ढोल धमाके बजी दुंदुभी गली गली में शोर
छोटे बाबा निकल पड़े हैं कुण्डलपुर की ओर

बड़े बाबा के दर्शन करने छोटे बाबा आएंगे
पलक पाँवड़े बिछे हुए हैं वर्षो की प्यास बुझाएंगे
घडी मिलन की दूर नहीं सब हैं भाव विभोर
छोटे बाबा निकल पड़े हैं कुण्डलपुर की ओर

श्री आदिप्रभु के चरणों में जब समवशरण लग जायेगा
निरख छवि भगवन द्वय की 'ब्रज' पाप तिमिर भाग जायेगा

जीव जगत के हुए प्रफुल्लित जिसका ओर न छोर
छोटे बाबा निकल पड़े हैं कुण्डलपुर की ओर
👣👣👣
-ब्रजेश जैन पाटन

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