Chobisi ►07 ►Stavan for Bhagwan Suparshavanatha

Posted: 22.03.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji

Acharya Jeetmal

Language: Rajasthani:


{7~~ तीर्थंकर सुपार्श्व प्रभु}

भजियै नित्य स्वामी सुपास ए।

सुपास सातमाँ जिणंद ए,ज्यांनै सेवै नर व्रंद ए।
सेवक पूरण आशा ए,भजियै नित्य स्वामी सुपास ए।।१।।

ज न प्रतिबोधण काम ए,प्रभु बागरै वाण अमाम ए।
संसार स्यूं हुवे उदास ए,भजिये नित्य स्वामी सुपास ए।।२।।

पामें कामभोग थी उद्वेग ए,बलि उपजै परम् संवेग ए।
एहवा तुम बच सरस विलास ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए।।३।।

घणी मीठी चक्री नीं खीर ए, बलि खीर -समुद्र नो नीर ए।
एह थी तुम वच अधिक विमास ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए।।४।।

सांभल नै जनव्रन्द ए,रोम-रोम मे पामै आनंद ए।
ज्यांरी मिटै नरकादिक त्रास ए,भजियै नित्य स्वामी सुपास ए।।५।।

तूं प्रभु! दीन-दयाल ए,तूं ही अशरण -शरण निहाल ए।
हूं छूं तुम्हारो दास ए,भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।६।।

संवत उगणीसै सोय ए,भाद्रवा सुदि तेरस जोय ए।
पहूंची मन नीं आशा ए, भजियै नित्य स्वामी सुपास ए ।।७।।

 

Lord Suparshvanath
Bhagwan Suparshavanatha

Swastika
Symbol - Swastika

 

 

 

 

07

Stavan for Bhagwan Suparshavanatha

 

Acharya Tulsi

4:28

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

3:01


Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

{अर्थ~~7 तीर्थंकर सुपार्श्व प्रभु}

अर्हत् सुपार्श्व का प्रतिदिन भजन करें।

सुपार्श्व प्रभु! तुम सातवें तीर्थंकर हो । देव और मनुष्य तुम्हारी उपासना कर रहे है।तुम उपासकों की आशा पूरी करने वाले हो।

जनता को प्रतिबोध देने के लिए तुमने अनुपम देशना दी। उसे सुनने वाले संसार से उदासीन हो गए।

प्रभो! तुम्हारी वाणी का विलास इतना सरस है की उसे सुनने वाले काम -भोग से उद्विग्न हो जाते है और उनके मन में परम् संवेग उतपन्न हो जाता है।

चक्रवर्ती की खीर और क्षीर -समुन्द्र का नीर ये दोनों बहुत मधुर होते है, तुम्हारी वाणी उनसे भी अधिक मधुर थी।

तुम्हारी वाणी सुनकर जन -समूह रोम -रोम में आनन्द का अनुभव कर रहा है। उस वाणी को सुनने वालों के नरक आदि का संत्रास दूर हो जाता है।

प्रभो! तुम दीनदयाल हो और अशरण के शरण हो ।में तुम्हारे चरणों का दास हूँ।

मेरे मन की आशा पूरी हो गयी।

रचनाकाल -वि. सं.१९००,भाद्रव शुक्ला त्रयोदशी।

 

English Translation:

 

7th Tirthankara Suparshvanatha

Chant Arhat Suparshvanatha everyday

Lord Suparshvanatha! You are the 7th Tirthankara. Human and Deities also worship you. Lord! you fulfill all the desires of devotees.

You gave nonsuch holy preaches to make people avail perceptiveness. People who heard your pulpitry, got detached with the materialistic world.

Lord! Bliss of your heavenly voice is very delightful. People who hear this become passionless about lustiness and a paramount impetus arises inside them.

Kheer (a sweet dish made from milk and rice) which is cooked in the Chakravrati's kitchen and the water of Ksheer Samudra (the ocean which has very delicious and sweet water) are very sweet in taste but your heavenly voice was sweeter than both of them.

People experience a great rejoice in each and every pore inside them when they hear your heavenly voice and these fortunate people who can hear this get rid of terror of hell.

Lord! You are pitiful and the protector of the unassisted. I am a captive of your holy feet.

Now all my wishes have been accomplished.

Time of Composing: V.S 1900, 13 day of Shukla Bhadrava.

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