Chobisi ►06 ►Stavan for Bhagwan Padmaprabha

Posted: 21.03.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji

Acharya Jeetmal

Language: Rajasthani:


6~तीर्थंकर पदम प्रभु
पदम् प्रभु नित समरिये।

निर्लेप पदम् जिसा प्रभु,प्रभु पदम् पिछाण।
संयम लीधो तिण समै,पाया चौथो नाण।।१।।

ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नै, पाया केवल सोय।
दीन दयाल तणी दशा,केणी नावै कोय।।२।।

सम दम उपशम रस भरी,प्रभु! आपरी वाण ।
त्रिभुवन तिलक तूं ही सही,तूं ही जनक समान।।३।।

तूं प्रभु कल्पतरु जिसो, तूं चिंतामणि जोय।
समरण करतां आपरो,मन- वांछित होय।।४।।

सुखदायक सहु जग भणी, तूं ही दीनदयाल।
शरण आयो तुझ साहिबा! तुन ही परम् कृपाल।।५।।

गुण गातां मन ग़ह-गहै, सुख सम्पति जाण।
विघन मिटै समरण कियां,पामैं परम् कल्याण ।।६।।

उगणीसै नै भाद्रवै, सुदि बारस देख।
पदम् प्रभु रट्या लाङनु,हुआ हरष विशेष।।७।।

 

Lord Padmaprabhu
Bhagwan Padmaprabha

Lotus
Symbol - Lotus

 

 

 

 

06

Stavan for Bhagwan Padmaprabha

 

Acharya Tulsi

6:49

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

3:51


Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

{अर्थ~~6 तीर्थंकर पदम् प्रभु}

पदम प्रभू का प्रतिदिन सुमिरन करें।

पद्म प्रभु! तुम कमल की भांति निर्लित थे। तुमने जिस क्षण साधुत्व स्वीकार किया,उसी क्षण तुम्हें मनः पर्यव ज्ञान प्राप्त हो गया ।

प्रभो! तुमने शुक्ल ध्यान में लीन होकर केवलज्ञान प्राप्त किया.  उस समय तुम्हारी जो स्थिति बनी,वह अनिर्वचनिय हैः

 प्रभो! तुम्हारी वाणी शम, दम और उपशम रस से आप्लावित है।
तुम्ही  इस त्रिलोकी के तिलकोर पिता के समान हो।

प्रभो! तुम कल्प वृक्ष और चिंता मणि रत्न के समान हो। तुम्हारा सुमिरन करने से मनोवांछित काम सिद्ध हो जाता है।

प्रभो! तुम इस समुचे जगत के लिए सुख- दायक हो,तुम ही दिन दयाल हो तुम्ही परम कृपाल हो, इस लिए में तुम्हारी शरण में आया हूँ।

प्रभो! तुम्हारे गुणों का संगान  करने से मन उल्लसित होता है।और सुख -सम्पत्ति उपलब्ध हो जाती है।तुम्हारा सुमिरन करने से विघ्न दूर होते है,और परम् कल्याण की प्राप्ति होती है।

प्रभो! तुम्हारी स्तुति की,उससे मुझे अपार हर्ष हुआ है।

{रचनाकाल-वि.सं.१९००,भाद्रव शुक्ला द्वादशी ।रचना स्थल:लाडनूं"}

 

English Translation:

6th Tirthankara Padamprabhu

We should recite Padamprabhu everyday.

Padamprabhu you were stoic like the louts. The moment you got initiated into the Monkhood, you got Manahparyaya Gayn on the dot.

Lord! You engrossed yourself in Shukla Dhyan and availed Kevalgyana. Your aspect of that moment is indescribable.

Lord! Your heavenly voice is suffused with the delight of ataraxia and staying power. You are the father figure of this microcosm.

Lord! You are like Kalpavriksha and Chintamani Ratna (jewel of meditative hyacinth which fulfils all desires of its owner). All desired targets are accomplished by glorifying you.

Lord! You are the paraclete, merciful for pauper and paramount benevolent of the entire universe. Just because of this I have come in your protection.

Lord! My heart exuberates by glorifying your merits and happiness and wealth become accessible. nuisance dissipates and blissfulness comes along.

Lord! I eulogize you, I am shoreless cheerful by this act.

Time of Composing: V.S. 1900, 12th day of Shukla Bhadrava, Place: Ladnun

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