Chobisi ►04 ►Stavan for Bhagwan Abhinandannatha

Posted: 18.03.2016
Updated on: 19.03.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji

Acharya Jeetmal

Language: Rajasthani:


4~तीर्थंकर अभिनन्दन प्रभु

अभिनन्दण वांदू नित्य मनरली।

तिर्थंकर हो चौथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली।
विषय -विटंबण हो तजिया विष फल जाण,अभिनंदण वांदू नित्य मनरली।।१।।

दुःकर करणी हो किधी आप दयाल,ध्यान सुधारस सम दम मन गली।
संग त्याग्यो हो जाणी माया -जाल, अभिनन्दण वांदू नित्य मनरली ।।२।।

वीर रसे करी हो कीधी तपस्या विशाल,अनित्य अशरण -भावन अशुभ निरदली।
जग झुठो हो जाण्यो आप कृपाल, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली।।३।।

आतम मिंत्री हो सुखदाता सम परिणाम,एहिज अमित्र असुभ भावे कलकली।
एहवी भावन हो भाई जिन गुण-धाम,अभिनदन वांदू नित्य मनरली।।४।।

लीन संवेगे हो ध्यायो शुकल ध्यान,क्षायक-श्रेणी चढ़ी हुवा केवली।
प्रभु पाम्या हो निरावण सुज्ञान,अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।।५।।

उपशम -रस नीं हो बागारी प्रभु बाण,तन मन प्रेम पाया जन सांभली।
तुम वच धारी हो पाम्या परम कल्याण,अभिनंदण वांदू नित्य मनरली।।६।।

जिन अभिनदण हो गाया तन मन प्यार,संवत उगणीसै भाद्रवै अघ दली।
सुदि इग्यारस हो हुवो हर्ष अपार,अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।।७।।

 

Lord Abhinandannath

Bhagwan Abhinandannatha

Monkey
Symbol - Monkey

 

 

 

 

04

Stavan for Bhagwan Abhinandannatha

 

Acharya Tulsi

5:53

http://www.herenow4u.net/fileadmin/v3media/pics/persons/Babita_Gunecha/Babita_Gunecha_560.jpg

Babita Gunecha

5:16


Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

{अर्थ~~4 ~ तीर्थंकर अभिनन्दन प्रभु}

अभिनंदन प्रभो! मै मानसिक प्रसन्नता से तुम्हे प्रतिदिन वंदन करता हूँ।

१: प्रभो! तुम चौथे तीर्थंकर हो।इस जगत् में सूर्य हो।तुमने गृहवास को त्याग अपनी मति को निर्मल बना लिया। तुमने विषय -प्रपंच को विष-फल समझकर त्याग दिया।

२:प्रभो! तुमने दुष्कर करणी की,शम और दम के द्वारा ध्यानरूपी अमृतरस में मन को लीन कर दिया ।आसक्ति को मायाजाल समझकर छोड़ दिया।

३:प्रभो! तुमने वीर रस के द्वारा विपुल तपस्या की,अनित्य और अशरण भावना से असत्कर्मो का निर्दलन किया तथा जागतिक सम्बन्धो को अवास्तविक समझा।

४:समभाव में प्रतिष्ठित आत्मा मित्र है, सुखदायक है।अशुभ भावों में निमग्न यही आत्मा शत्रु है।हे गुणधाम! तुम ऐसी भावना से भावित थे।

५:प्रभो! मुमुक्षा में लीन होकर तुमने शुक्लध्यान किया ।तुम क्षायिक श्रेणी पर आरूढ़ होकर केवली बने - निरावण ज्ञान प्राप्त किया।

६:प्रभो! तुमने उपशम रस -भरी वाणी से उपदेश दिया। उसे जिन लोगों ने सुना,उनके तन, मन प्रीणित हो उठे ।जिन्होंने उसे हृदयंगम किया,उनका कल्याण हो गया।

७:प्रभो! मैने आंतरिक कल्मष दूर कर शारीरिक और मानसिक अनुराग से अर्हत् अभिनन्दन की स्त्वना की,इससे मुझे अपार हर्ष का अनुभव हुआ।

{रचनाकाल-वि.सं.१९००,भाद्रव शुक्ला एकादशी।

 

English Translation:

4th Tirthankara Abhinandannatha

Lord Abhinandan! With the infelt glee, I offer you Vandana everyday.

Lord! You are the Sun of this universe. You sacrificed living in the dwelling and purged your thoughts. You felt desire as Kimpak Fal and purposely gave it up.

Lord! Your doings were arduous, you have engrossed your soul in the delight of meditation by ataraxia and staying power.
You perceived indulgence as phantasm and gave it up.

Lord! You have done many Tapasyas bravely. With the help Anitya Bhavana and Asharan Bhavana you demolished eight Karma and perceived all cosmos relations as fantasy.

O Meritorious Lord! You were fanciful with sentiments like- The soul which sets up in equanimity is a fellow and the soul which is engrossed in evil thoughts is like an animal.

Lord! You did Shukla Dhyan by engrossing yourself in urgency of Moksha and mounting on corrosive degree of Karma you got salvation knowledge and became Kevali.

Lord! You preached in the heavenly voice filled with delight of solace. People who listened it, their body and mind felt blessed and who cherished it, are fortunate.

Lord! After dispelling inlying blemishes I did eulogy of Arhat Abhinandan fondly of body and mind, by this, I felt infinite rejoice.

Time of Composing: V.S. 1900, 11th day of Shukla Bhadrava.

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