24.11.2015 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 24.11.2015
Updated on: 05.01.2017

Update

बारह भावनाएं (बारह अनुप्रेक्षा)
१.अनित्य भावना
अनित्य भावना हमें सिखाती है...कि यह शरीर कि जवानी,घर-वार,राज्य संपत्ति,गाय-बैल,स्त्री के सुख,हाथी,घोड़े,परिवारीजन,कुटुम्बी जन..और आज्ञा को मानने वाले नौकर..और पांचो इन्द्रियों के भोग क्षण-भंगुर हैं..हमेशा नहीं रहते हैं..अनित्य हैं..अस्थायी हैं...यह सारे सुख आकुलता को देने वाले ही हैं..और दुःख को देने वाले ही हैं....यह सुख बिजली और इन्द्रधनुष कि चंचलता के सामान क्षण-भंगुर हैं..जिस प्रकार इन्द्र-धनुष और बिजली कुछ सेकंड के लिए ही आसमान में रहती हैं..उसी प्रकार यह इन्द्रिय जन्य सुख औ राज्य संपत्ति,गोधन,गृह,नारी,हाथी घोड़े थोड़े समय के लिए ही हैं...अनित्य हैं.

जिस प्रकार विवेकी जीव झूठे भोजन को खाने में,चाहे कितना भी स्वादिष्ट हो..कभी ममत्व नहीं दिखता है..उसी प्रकार इस अनित्य भावना को भाने से जीव इस संसार के झूठे भोगों से,लाखो बार भोगे हुए भोगों से कभी ममत्व नहीं करता है..और न ही इनके वियोग में अरति करता और संयोंग में रति करता है
यह अनित्य भावना भाने का फल है.

२.अशरण भावना
अशरण का अर्थ है कहीं भी शरण नहीं है....चाहे सुरेन्द्र,असुरेन्द्र,नागेन्द्र हों,खगेंद्र..नरेन्द्र हों....वह भी काल रुपी सिंह के सामने हिरण के सामान हैं...और उनको भी शरीर को त्याग कर...नई योनियों में सारे महल राज पाट छोड़ के जाना पड़ता है...और कर्मों का फल भोगना पड़ता है.....चाहे कैसी भी मणि हो,मंत्र हो,तंत्र हो,बड़े से बड़ी शक्ति हो,माता,पिता,देवी,देवता,सेना,औषधि,पुत्र...या कैसा भी चेतन या अचेतन पदार्थ हो...मृत्यु से कोई नहीं बचा सकता है....तथा मृत्यु से कोई नहीं बच सका है...कहीं भी शरण नहीं है.यह अशरण भावना है
इस अशरण भावना को भाने से समता भाव जागृत होता है..और इस भावना को भाने वाला जीव शरीर त्याग के समय शोक नहीं करता है..और न ही किसी अन्य के देह-अवसान में शोक करता है....और न ही संसार के भौतिक-सुखों में रति करता है.

३.संसार भावना
यह जीव चारो गतियों में चाहे स्वर्ग हो,नरक हो,मनुष्य पर्याय हो,या तिर्यंच पर्याय हो...सब में दुःख ही दुःख भोगता है,कहीं भी इस संसार में सुख नहीं नहीं है..हर तरफ से हर दृष्टी से यह जीव चारो गतियों में दुःख भोगता है..और द्रव्य,क्षेत्र,भाव,भव और काल के परिवर्तन सहता है यानि की हर विधि से हर तरीके से संसार असार है,बिना किसी सार का है,हर जगह दुःख है..और इस संसार में कहीं भी सुख नहीं है...ऐसा चिंतन करना संसार भावना का लक्षण है.

इस भावना को भाने वाला जीव कभी भी दुखी नहीं होता है..लेकिन संसार से उदासीन रहता है...वैरागी रहता है.

४.एकत्व भावना
सारे शुभ और अशुभ कर्मों के फल जितने भी हैं..यह जीव अकेला हो भोगता है..कोई साथ न देने वाला होता है...माता,पिता,पुत्र,नारी,दोस्त,रिश्तेदार अपनी कोई रिश्तेदारी नहीं निभाते हैं....सिर्फ स्वार्थ के लिए सगे बन जाते हैं...और स्वार्थ ख़त्म होने पर धोका दे जाते हैं...चाहे सुख हो या दुःख यह जीव अकेला ही सहन करता है...साथी-सगे तोह सब कहने मात्र के हैं.

५.अन्यत्व भावना
यह जीव और शरीर,पानी और दूध के सामान एक दुसरे से मिले हुए हैं...लेकिन फिर भी दोनों-दोनों भिन्न-भिन्न हैं.एक नहीं हैं..अगर शरीर और आत्मा एक ही होती तोह क्या मुर्दे में जान नहीं होती,फिर ऐसा क्यों होता है कि आत्मे के शरीर से निकलते ही..सारा शरीर ऐसे ही पड़ा रह जाता है,कहाँ चली जाती है उसमें से चेतनता..यानि कि हम जीव हैं,शरीर नहीं हैं...जब शरीर और आत्मा अलग हैं तब जो पर-वस्तुएं,भौतिक वस्तुएं हैं..धन,घर,परिवार है राज्य है,सम्पदा है,पुत्र है,स्त्री है..वह मेरी कैसे हो सकती है...ऐसा चिंतन करना अन्यत्व भावना है

६.अशुचि भावना
यह शरीर मांस,खून,पीप,विष्ट,गंध्गी,मल,मूत्र,पसीना..अदि कि थैली है..और हड्डी,चर्बी अदि अपवित्र पदार्थों से मलिन है...और इस शरीर में से नौ द्वार में से निरंतर मैल निकलता रहता है...और इतना ही नहीं इस शरीर के स्पर्श से पवित्र पदार्थ भी अपवित्र हो जाते हैं...बहुत गंध है यह शरीर..और ऐसे शरीर से कौन प्रेम करना चाहेगा,कौन मोह रखना चाहेगा...ऐसा चिंतन करना अशुचि भावना है.

७.आश्रव भावना
मन-वचन और काय के निमित्त से आत्मा mein हलन-चलन-कम्पन रूप चंचलता को आश्रव कहते हैं..आश्रव से कर्म आते हैं..यह आश्रव बहुत दुःख दाई है..क्योंकि इसकी वजह से आत्मा के प्रदेश कर्मों से बंधते हैं..जिससे आत्मा का अनंत सुख वाला स्वाभाव ढक जाता है,ज्ञान दर्शन स्वाभाव ढक जाता है..इसलिए बुद्धिमान पुरुष इस आश्रव से दूर रहने के प्रयत्न में लगे रहते हैं..इससे मुक्त होने की चाह रखते हैं..मिथ्यादर्शन,अविरत और कषाय और प्रमाद के साथ आत्मा में परवर्ती नहीं करते हैं..और कम करते हैं.ऐसा चिंतन करना आश्रव भावना है.

८.संवर भावना
जिन्होंने पुण्य और पाप नहीं किया,शुभ और अशुभ कर्मों के फल में रति और अरति नहीं कि..शुभ और अशुभ भाव नहीं किये....और आत्मा के अनुभव में मन को लगाया..आत्मा स्वाभाव में लीं हुए..या लीं होने..वह आते हुए कर्मों को आत्मा के प्रदेशों में मिल जाने से रोक लेंगे..कर्मों के आश्रव द्वार को बंद करेंगे,बंध को रोक लेंगे...और संवर को प्राप्त करके आकुलता रहित सुख का साक्षात्कार करेंगे..ऐसी भावना भाना संवर भावना है.

९.निर्जरा भावना
जब कर्म अपना समय आने पर फल देने लग जाए..मतलब अपने अपने समय पर फल देने लग जाएँ..और फल देकर चले जाएँ..यह तो अकाम निर्जरा है..या विपाक निर्जरा..इससे इस जीव का कोई भी लाभ नहीं है..कोई भी काम सिद्ध नहीं होता है..जब कर्म बिना फल दिए ही चले जाए..जो सिर्फ सम्यक तप के माध्यम से संभव है..तोह अविपाक निर्जरा है..सकाम निर्जरा है..जो शिव सुख को,मोक्ष सुख को आकुलता रहित सुख को प्राप्त कराती है

१०.लोक भावना
जहाँ ६ द्रव्यों का निवास है,वह तीन लोक हैं..जो शास्वत ६ द्रव्यों से बना हुआ है..इसको न किसी ने बनाया है..न कोई धारण कर रहा है,न कोई चला रहा है..और न ही कभी नष्ट होंगे..और ६ द्रव्य भी शास्वत हैं..अनादि निधन हैं यह तीनों लोक..इन तीनों लोकों में यह जीव समता भाव के अभाव में..संतोष के अभाव में,वीतरागता और वीतराग भावों के अभाव में यह जीव संसार में दुःख सहता है...और जन्म मरण के दुखों को सहन करता है...वीतराग अवस्था पाने से यह जीव आकुलता रहित सुख को प्राप्त करता है.

११.बोधि दुर्लभ भावना
इस जीव ने नवमें ग्रैवेयक के विमानों तक..जो सोलह स्वर्गों से भी ऊपर हैं..वहां भी पर्याय ली..और एक बार नहीं अनंत बार यहाँ पर्याय ले कर अह्मिन्द्र,अदि देवों तक का पद पाया...लेकिन जब भी आत्मा के ज्ञान के बिना इस जीव ने सुख लेश मात्र नहीं पायो..नरक,त्रियंच मनुष्य की योनियों में दुःख की बात करें तोह चलता है..लेकिन स्वर्गों में भी यह जीव दुखी रहा..और वहां भी लेश मात्र भी सुख ग्रहण नहीं किया...जो की सम्यक ज्ञान के अभाव की वजह से था...और ऐसे दुर्लभ सम्यक ज्ञान को मुनिराज ने अपने ही आत्मा स्वरुप में साधा हुआ..कहीं बाहार से नहीं खोजा है..इसलिए संसार में सबकुछ सुलभ है,घर,परिवार,कुटुंब,उत्तम कुल, विद्या, धन,पैसा,बुद्धि,होसियारी...यह सब सम्यक ज्ञान की दुर्लभता के आगे सुलभ ही हैं..और यह सम्यक ज्ञान अपार सुख को प्राप्त करने वाला है.आकुलता रहित सुख को प्राप्त करता है.कर्मों का जोड़ इस सम्यक ज्ञान रुपी छैनी के द्वारा ही तोडा जाता है.

12.धर्म भावना
जो भाव पवित्र हैं और मोह से रहित हैं..मिथ्यात्व(गृहीत और अग्रहित) से रहित हैं.वह सम्यक ज्ञान,सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र हैं और यह ही धर्म है..जब इस धर्म को जब यह जीव साधता है..धारण करता है..तोह अचल सुख को प्राप्त प्राप्त करता है..यानि की जहाँ मोह-मिथ्यात्व है वहां धर्म नहीं है...ऐसा चिंतन करना धर्म भावना है लिखने का आधार-६ ढाला-रचयिता श्री दौलत राम जी.

News in Hindi

❖ GREAT MEN'S VIEW ON JAINISM

"I adore so greatly the principles of the Jain religion, that I would like to be reborn in a Jain community."
- George Bernard Shaw

"In conclusion let me assert my conviction that Jainism is an original system, quite distinct and independent from all others; and that therefore it is of great importance for the study of philosophical thoughts and religious life in ancient India."
- Dr. Herman Jacobi

"What would be the condition of the Indian Sanskrit literature if the contribution of the Jains were removed? The more I study Jain literature the more happy and wonder struck I am."
- Dr. Hertel, Germany

"Jainism is of a very high order. Its important teachings are based upon science. The more the scientific knowledge advances the more that Jain teachings will be proven."
- L. P. Tessetori, Italy

"Lofty ideas and high ascetic practices are found in Jainism. It is impossible to know the beginning of Jainism."
- Major-General Forlong

"The Jains have written great masterpieces only for the benefit of the world."
- Dr. Hertel, Germany

"I say with conviction that the doctrine for which the name of Lord Mahavir is glorified nowadays is the doctrine of Ahimsa. If anyone has practiced to the fullest extent and has propagated most the doctrine of Ahimsa, it was Lord Mahavira."
- Mahatma Gandhi

"I am not Rama. I have no desire for material things. Like Jina I want to establish peace within myself."
- Yoga Vasishta, Chapter 15, Sloka 8 the saying of Rama

"O Arhan! You are equipped with the arrow of Vastuswarpa, the law of teaching, and the ornaments of the four infinite qualities. O Arhan! You have attained omniscient knowledge in which the universe is reflected. O Arhan! You are the protector of all the Souls (Jivas) in the world. O Arhan! The destroyer of kama (lust)! There is no strong person equal to you."
- Yajur Veda, Chapter 19, Mantra 14

"Mahavira proclaimed in India that religion is a reality and not a mere social convention. It is really true that salvation can not be had by merely observing external ceremonies. Religion cannot make any difference between man and man."
- Dr. Rabindranath Tagore

"We learn from scriptures (Sashtras) and commentaries that Jainism is existing from beginningless time. This fact is indisputable and free from difference of opinion. There is much historical evidence on this point."
- Lokamanya Bala Gangadhar Tilak

"Jainism has contributed to the world the sublime doctrine of Ahimsa. No other religion has emphasized the importance of Ahimsa and carried its practice to the extent that Jainism has done. Jainism deserves to become the universal religion because of its Ahimsa doctrine."
- Justice Ranglekar, Bombay High Court

"The Jain Sadhu leads a life which is praised by all. He practices the vratas and rites strictly and shows to the world the way one has to go in order to realize the atma (soul). Even the life of a Jain householder is so faultless that India should be proud of him.."
- Dr. Satischandra Vidhya Bhushan

"The right of welcoming the delegates of the universal peace organization belongs to the Jains only. Because Ahimsa alone contributes to the establishment of universal peace. Tirthankaras, the propounders of Jainism, preached to the world the Ahimsa doctrine. Therefore, who else except the followers of Bhagavan Parsvanath and Mahavira can preach universal peace?"
- Dr. Radha Vinodpal

"There is nothing wonderful in my saying that Jainism was in existence long before the Vedas were composed."
- Dr. S. Radhakrishnan, Vice-President, India

"Truly speaking, Jainism is an independent and original religion, for it is neither Hinduism nor Vedic religion, but of course it is an aspect of Indian life, culture, and philosophy.."
- Shri Jawaharlal Nehru, Prime Minister, India

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Bhavana: (Contemplations / Reflection) By Atul Bafna

The Jain way of lifs emphasizes the thinking of a person, subject matters of one's thoughts, what a person thinks, and how he thinks. This is called Bhavana, yearnings, thought, aspirations, or reflections. The Bhavana describes the subject matters of one's contemplation, and how to occupy one's mind with useful, religious, beneficial, peaceful, harmless, spiritually advancing, karma preventing thoughts. The Bhavanas, also called Anuprekshaas, help one to remain on the right course in the life, and not to stray away. The person's behavior, practical life, or action is the resultant of his internal thoughts, day in and day out. The Bhavanas are twelve in number.

(1) Anitya bhavana: (The Impermanence of the sansaar or world)
Nothing in the Universe has permanence, even though the whole Universe is constant. Spiritual values are therefore worth striving for as they alone offer the soul, its ultimate freedom and stability.
(2) Asharana bhavana: (The refuge to the sansaar, i.e. world of becoming, is misleading).
The soul is own refuge, and to achieve total freedom and enlightenment to the true path one takes refuge to five best personalities, namely Arihanta, Siddha, Aachaarya, Upaadhyaaya and Sadhus. The refuge to things other than above due to delusion, is misfortune, and must be avoided.
(3) Ekatva bhavana: (The aloneness of the Soul)
The soul is solitaire, and lonely in existence. The Soul assumes birth alone, and departs alone from the life form. The Soul will be responsible for its own actions, and karmas. The Soul will enjoy the fruit, and suffer bad consequences of its own action alone.
(4) Anyatva bhavana: (The Self-dependence, separateness)
In this world nobody is for somebody, and somebody is for nobody. The soul therefore should not develop attachment for worldly objects and beings.
(5) Sansaara bhavana: (The Worldly existence)
The soul transmigrates from one life to the other and in four gatis, human, animal, hellish, heavenly, and is full of pain and miseries. The Soul must achieve ultimate freedom from it, which is moksha.
(6) Ashuchi bhavana: (The impureness of the body):
The composition of the body will reveal all the things we loathe, such as excrement, urine, blood, meat, bones, sweat, and so on, and therefore is impure. The Soul, within the body but unattached to the body, alone is pure. The body ultimately becomes non existent, but the Soul continues on, is eternal. The emotional attachments to the body is useless.
(7) Aashrava bhavana: (Influx of Karma contemplations)
Raag, Dwesh, and ignorance attract new karmas. Deluded state and how to be free from delusion is the subject matter of this thought activity.
(8) Samvar bhavana: (Stoppage of influx of Karma)
To get absorbed in achieving spiritual knowledge, meditation, etc. prevents the influx of karmas.
(9) Nirjaraa bbaavanaa: (Karma Shedding)
Ths efficacy of discipline and penance for freeing oneself from the bondage of the karma.
(10) Loka bhavana: (Universe)
To Think of the nature and structure of the universe. The Universe consists of six substances, Soul, Pudgal, Dharma, Adharma, Kaala, Space. The Universe is grouped into three divisions
- Urdhvaloka, or heavenly areas above us where among
other heavenly objects, super-life called Gods live
- Madhyaloka; or central area were humans and animals live.
- Adholoka, which is located in the lower regions of the
Universe, where hellish beings, live.
On the top of the Universe is Siddba-shila where liberated souls, or Siddhaas live. Apparently, Siddh-shila at one end of the Universe creates the reference as the highest position in the universe, earth in the central region, and other referenced high, or low from the earth.
(11) Bodhidurlabha bhavana: (Unobtainability of true talent)
It is very difficult for the transmigrating soul in this sansaar (world) to be close to, or be opportune to be acomplishing right faith, right knowledge, and right conduct, etc. So when you have the opportunity to be a Jain, take advantage of it to develop right religious talent.
(12) Dharmadurlabha bhavana: (Unobtainability of true preceptor, scripture and religion).
To be able to distinguish right religion, scripture, preceptor etc. from the wrong, and to follow the right, requires good judgement. The Dharma is characterized by:

Uttama Kshamaa (Forbearance, Forgiveness),
Uttama Maardava (Modesty, Humility)
Uttama Aarjava (Straightforwardness)
Uttama Saucha Purity),
Uttama Satya (Truth),
Uttama Samyama (Self-restraint, Control of Senses),
Uttama Tapa (Austerity, Penence),
Uttama Tyaaga (Renunciation),
Uttama Akinchanya (Non attachment),
Uttama Brahmacharya (Celibacy, Chastity).
The word Uttama is indicative of the power and authority of Samyag darshan, or right perception.